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बेल खाने के फायदे व प्रकार

रूटेसिऐई कुल का बेल फल (Bael) उत्तरी भारत का मूलज माना जाता है परन्तु अन्य देशो में भी उगाया व अपने औषधीय गुणों के कारण सराहा जाता है। इसमें कई फ़ाइटोकान्स्टीट्यूट्स होते हैं. मार्मेनोल, मार्मिन, मार्मेलोसिन, मार्मेलिड, प्सारेलेन, एलोइम्पॅरेटोरिन, रुटेरॅटिन, स्कापोलेटिन, एइगेलिन, मार्मेलिन, फ़ॅगेरिन, एन्हाइड्रोमार्मेलिन, लिमोनेन, ऐ-फेल्लॅण्ड्रेन, बेटुलिनिक अम्ल, मार्मेसिन, इम्पॅरेटोरिन, इउवेंगेण्टिन एवं आरोप्टेन।

बेल का सेवन खाली पेट न करने का सुझाव दिया जाता है। इसके अतिरिक्त सौंफ़, हींग, धनिया व सौंठ (सूखा अदरख) मिलाकर यदि सेवन किया जाये तो पोषक तत्त्वों का अवशोषण शरीर में बेहतर रूप से हो पाता है।

बेल खाने के फायदे

विटामिन्स में भरपूर – बेल में Vitamin A, B1 व सी होता है, इस कारण नेत्र-समस्याओं, पाचन-विकारों, हृदय रोगों, त्वचा रोगों के उपचार में सहायक है तथा व्यक्ति को विभिन्न संक्रमणों से बचाते हुए सम्पूर्ण प्रतिरक्षण (Immunity) को बढ़ाता है। विटामिन-सी की कमी से होने वाले स्कर्वी में हाथ-पैर कमज़ोर पड़ने लगते हैं, इस स्थिति में बेल का विटामिन-सी शीघ्र नीरोग करने में बड़ा सहायक सिद्ध होगा।

कैल्शियम – अस्थियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कैल्शियम दाँतों को ठीक रखता है एवं अस्थिक्षय से बचाता है। चोटों के मामलों में यह रुधिर की अधिक मात्रा को बह जाने से रोकता भी है।

पोटेशियम – पोटेशियम की प्रचुरता बेल को उच्च रक्तचाप से जूझ रहे लोगों का साथी बना देती है। बेल धमनियों को कठोरता से बचाता है। स्ट्राक्स व हृदय-रोगों से बचाव से सहायक है।

पोटेशियम की अधिकता से बेल शरीर में सोडियम की अनावश्यक मात्रा को मूत्र के माध्यम से बाहर निकालने में भी सहायक है। इस प्रकार रक्तचाप को सामान्य करता तो है ही एवं साथ में सोडियम-जनित अन्य समस्याओं से उबारने में भी सहायक है।

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लौह – लौह में समृद्ध बेलफल नैसर्गिक रक्त-शोधक जैसा है जो शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं को बढ़ाता है व हीमोग्लोबिन की मात्रा में वृद्धि करता है। लोहे की कमी से होने वाले एनीमिया में तो बेलफल नियमित खाने को कहा जाता है।

दस्तरोधी बेल – बेल की जड़ के सत् एवं फल में भी इष्चिरिचिया कोलई एवं विब्रियो कोलेरी से लड़ने वाले तत्त्व पाये जाते हैं, ये सूक्ष्मजीव संदूषित पानी व खाने से शरीर में पहुँचते हैं। बेल में सूक्ष्मजीवरोधी (एण्टिमाइक्रोबियल), विशेषतया विषाणुरोधी (एण्टिवायरल) गुण होते हैं।

बेल की पत्तियों, जड़ों व फलों के सार कई जीवाण्विक प्रभेदों- बैक्टीरियल स्ट्रैन्स के विरुद्ध सक्रिय पाये गये हैं। अपने खनिजों के भी कारण बेल पाचन-तन्त्र को ठीक करने में उपयोगी रहता है। पेट अधिक ख़राब हो तो बेल के भरोसे न रहकर पेट रोगविशेषज्ञ के पास जायें।

रेडियोप्रोटेक्टिव प्रभाव

कैन्सर ठीक करने में रेडियोथिरेपी से समूचे शरीर पर प्रतिकूलताएँ भी झेलनी पड़ती हैं जिन्हें कम करने में बेल उपयोगी हो सकता है। रेडियो-चिकित्सा करने पर समीप वर्ती सामान्य ऊतकों की रेडियो-संवेदनशीलता से आयोनाइज़िंग विकिरण के कोशिका-विषाक्त (सायटोटाक्सिक) प्रभाव पड़ते हैं।

विकिरण से हुई हानियों के प्रभावों को कुछ कम करने में एवं कैन्सर-थिरेपी से जन्मे मुक्तमूलकों (फ्ऱी-रेडिकल्स) को हटाने में बेल आदि के एण्टिआक्सिडेण्ट यौगिक उपयोगी रह सकते हैं। इस उपयोग में सन्दर्भ में पत्ती का सत फल के सत से अधिक प्रभावी हो सकता है। पत्ती का सत पेट व आँत सहित रक्त सम्बन्धी क्षति रोकने में लाभकारी है।

प्रतिरक्षा-तन्त्र सुदृढ़ करे – बेल से इम्युन-एक्टिवेशन होता है एवं इम्युनोस्टिम्युलेण्ट्स से शरीर की सम्पूर्ण रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है एवं संक्रमणादि उतनी आसानी से नहीं हो पाते।

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कैन्सररोधी गुणधर्म – बेल में विशेषतया एण्टिनियोप्लास्टिक गुण होता है जिससे नियोप्लाज़्म (एक ट्यूमर) के विकास को रोकने में सहायता होती है।

एण्टिआक्सिडेण्ट्स का भण्डार – फ़्लेवॅनाइड्स जैसे कई फ़ाइटो केमिकल्स बेल में भरपूर होने से यह हृद्वाहिका तन्त्र सहित यकृत के रोगों को दूर रखता है एवं कोलेस्ट्रोल को कम करते हुए संक्रमणों को दूर रखता है।

सूजन रोधी बेल – बेलपत्र में तात्कालिक व दीर्घकालिक सूजन को दूर करने वाले तत्त्व पाये गये हैं।

बेल में उक्त के अतिरिक्त बुखारनाशक प्रभाव भी पाये गये हैं। बेल में मूत्रल (डाईयूरेटिक) लक्षण होने से यह वृक्कों (गुर्दों) को साफ रखने में उपयोगी है। बेल के कई यौगिकों में तपेदिक, यकृतशोथ (हिपैटाइटिस), व्रण (अल्सर) ठीक करने वाले गुण पाये गये हैं। कार्बोहाइड्रेट्स में सम्पन्न बेल कुछ परिमाण में सेवन किये जाने पर भी प्रचुर ऊर्जा प्रदान करने के कारण ऊर्जा प्रदायक है। इसके सेवन से मस्तिष्क-कोशिकाएं बेहतर कार्य कर पाती हैं तथा कोलेस्टेराल स्तर सँभालने में भी सहायक है।

इसकी पत्तियों के जरुरी तैल में कवकरोधी (एण्टिफ़ंगल) प्रभाव भी देखा गया है जिससे कई त्वचा रोगों से उबरने में बेल सहायक हो सकता है परन्तु स्थिति शीघ्र ठीक होती न दिखे तो त्वचारोग चिकित्सक से मिलें। जीवाणुरोधी गुणों वाला बेल कान में मोम को कठोर होने से रोकता है व बालों को जुओं से दूर रख सकता है तथा अस्थमारोधी गुण के कारण सर्दी-ज़ुकाम व बुखार के लक्षणों में राहत प्रदान करता है।

छाती में जमा कफ़ निकालते व बन्द नाक खोलते हुए बेल श्वसन-स्वास्थ्य के लिये भी लाभकर है। कब्ज़ व शिगेला सूक्ष्मजीव से राहत पाने में बेल सहायक है। बेल वृक्ष की छाल व कोपलों में उपस्थित फ़ेरोनिया गोंद मधुमेह से निपटने में उपयोगी है। यह कोशिकाओं से रक्तधारा में इन्स्युलिन के उत्पादन को विनियमित करती है। मधुमेह में अत्यधिक बेल-सेवन न करें, अन्यथा शर्करा का स्तर एकदम घटना भी हानिप्रद हो सकता है।

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किसी प्रकार की शल्य चिकित्सा अथवा रक्त जाँच के आसपास भी बेल-सेवन न करें ताकि शर्करास्तर को जाँचने व सामान्य रखने में कोई व्यवधान न आये। बेल के उत्पादों का सेवन करने वाली स्त्रियों में प्रोलॅक्टिन को बढ़ावा देते हुए स्तन्य दुग्ध उपादन को प्रेरित करता है एवं दूध की गुणवत्ता ठीक करता है। इस प्रकार नवजात के सम्पूर्ण स्वास्थ्य सहित रोग-प्रतिरोधक प्रणाली के लिये भी उपयोगी है। गुड़ व सौंठ मिलाकर बेल-रस का सेवन करने से यह प्रभाव बढ़ता पाया गया है किन्तु गर्भावस्था में बेल के अधिक प्रयोग के सन्दर्भ में स्त्रीरोग विशेषज्ञा से बात कर लें।

बेल का प्रयोग किन रूपों में होता है

1. सामान्य रूप से बेल के गूदे का सेवन
2. बेल का मुरब्बा
3. बेल-शर्बत मध्यम आकार के 3-4 पके बेल फल, चार कप दूध, एक कप पानी, स्वाद अनुसार गुड़, काला नमक व इलायची।

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