Lakshmi Panchali (লক্ষ্মী পাঁচালী) – हिंदी उच्चारण में संपूर्ण पाठ
(नीचे पूरी लक्ष्मी व्रत कथा बंगाली मूल शब्दों को बनाए रखते हुए हिंदी (देवनागरी) लिपि में दी जा रही है। यह अनुवाद नहीं, बल्कि बंगाली पाठ का हिंदी उच्चारण के अनुसार लिप्यंतरण है। बंगाली के कुछ शब्दों और ध्वनियों का उच्चारण क्षेत्र के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है।)
दोलपूर्णिमा निशीथे निर्मल आकाश।
मन्द मन्द बहितेछे मलय बातास।।
लक्ष्मीदबी बामे कोरि बोशि नारायण।
कोहितेछे नाना कोथा सुखे आलापन।।
हेनकाले बीणायन्त्रे हरि गुणगान।
उपनीत होइलेन नारद धीमान।।
धीरे धीरे उभपदे कोरिया प्रणति।
अतःपर कोहिलेन लक्ष्मीदबी प्रति।।
शुन गो, मा नारायणी, चलो मर्त्यपुरे।
तब आचरणे दुख पाइ्नु अंतरे।।
तब कृपा बंचित होइया नरनारी।
भुञ्जिछे दुर्गति कोत बर्णिबारे नारि।।
शतत कुकर्मे रत रोहिया ताहारा।
दुर्भिक्ष अकालमृत्यु रोगे शोके सारा।।
अन्नाभाबे शीर्णकाय रोगे मृतप्राय।
आत्महत्या केहो बा कोरिछे ठेके दाय।।
केहो केहो प्राणाधिक पुत्रकन्या सबे।
बेचे खाय हाय हाय अन्नेर अभाबे।।
अन्नपूर्णा अन्नरूपा त्रिलोकजननी।
बल देवी, तबु केनो हाहाकार शुनि।।
केनो लोके लक्ष्मीहीन संपद अभाबे।
केनो लोके लक्ष्मीछाड़ा कुकर्म प्रभावे।।
शुनिया नारदबाक्य लक्ष्मी ठाकुरानी।
सघने निःश्वास त्यजि कोहे मृदुबाणी।।
सत्य बाछा, इहा बड़ा दुखेर बिषय।
कारण इहार याहा शोनो समुदय।।
आमि लक्ष्मी कारो तरे नाहि कोरि रोष।
मर्त्यबासी कष्ट पाय भुञ्जि कर्मदोष।।
मजाइले अनाचारे समस्त संसार।
केमने थाकिब आमि बल निर्विकार।।
कामक्रोध लोभ मोह मद अहंकार।
आलस्य कलह मिथ्या घिरिछे संसार।।
ताहाते होइया आमि घोर ज्वालातन।
होयेछि चंचला ताइ ओहे बाछाधन।।
परिपूर्ण हिंसा द्वेष तादेर हृदय।
परश्री हेरिया चित्त कलुषित मय।।
रसनार तृप्ति हेतु अखाद्य भक्षण।
फल तार हेरे ऋषि अकाल मरण।।
घरे घरे चलियाछे एइ अबिचार।
अचला होइया रब कोन से प्रकार।।
एसब छाड़िया जेबा कोरे सदाचार।
तार गृहे चिरदिन बशति आमार।।
एत शुनि ऋषिबर बोले, नारायणी।
अनाथेर माता तुमि बिघ्नबिनाशिनी।।
किबा भाबे पाबे सबे तोमा पदछाया।
तुमि ना राखिले भक्ते के कोरिबे दया।।
विष्णुप्रिया पद्मासना त्रितापहारिणी।
चंचला अचला होओ पापनिबारिणी।।
तोमार पदेते मा मोर ए मिनति।
दुख नाशिबार तब आछे गो शक्ती।।
कोह देवी दया कोरे इहार बिधान।
दुर्गति हेरिया सब कांदे मोर प्राण।।
देबर्षिर बाक्य शुनि कमला उतला।
ताहारे आश्वास दाने बिदाय कोरिला।।
जीबेर दुख हेरि कांदे मातृप्राण।
आमि आशु कोरिब गो इहार बिधान।।
नारद चलिया गेले देवी भाबे मने।
एत दुख एत ताप घुचाब केमने।।
तुमि मोरे उपदेश दाओ नारायण।
जाहाते नरेर होय दुख बिमोचन।।
लक्ष्मीबाणी शुनि प्रभु कोहेन उत्तर।
ब्यथित कि हेतु प्रिया बिकल अंतर।।
जाहा बलि, शुन सति, बचन आमार।
मर्त्यलोके लक्ष्मीब्रत कोरह प्रचार।।
गुरुबारें संध्याकाले जत नारीगण।
पूजा कोरि ब्रतकथा कोरिबे श्रवण।।
धन धान्य यश मान बाड़िबे सबार।
अशांति घुचिया होबे सुखेर संसार।।
नारायण बाक्ये लक्ष्मी हरष मनते।
ब्रत प्रचारणे जान त्वरित मर्त्यते।।
उपनीत होन देवी अवन्ती नगरे।
तथाय हेरें जाहां स्तम्भित अंतरे।।
धनेश्वर राय होय नगर प्रधान।
अतुल ऐश्वर्य तार कुबेर समान।।
हिंसा द्वेष बिजारित सोनार संसार।
निर्बिचारे पालियाछे पुत्र परिवार।।
एकान्नते सप्तपुत्र राखि धनेश्वर।
अवसान नरजन्म जान लोकांतर।।
पत्नीरे कुचक्रे पड़ि सप्त सहोदर।
पृथगन्न होल सबे अल्प दिन पर।।
हिंसा द्वेष लक्ष्मी त्याजे जत किछु होय।
एके एके आसि सबे गृहे प्रवेशय।।
एसब देखिया लक्ष्मी अति क्रुद्धा हल।
अविलम्बे सेइ गृह त्यजिया चलिल।।
बृद्ध रानी मरे हाय निज कर्मदोषे।
पुरीते तिष्ठिते नारे बधू देर रोषे।।
परान त्यजिते जान निबिड़ कानने।
चलिते अशक्त बृद्धा अश्रु दुनयने।।
छद्मबेशे लक्ष्मीदबी आसि हेन काले।
उपनीत होइलेन से घोर जंगले।।
सदय कमला तबे जिज्ञासे बृद्धारे।
किबा हेतु उपनीत ए घोर कांतारे।।
लक्ष्मीबाक्ये बृद्धा कोहे शोन ओगो माता।
मन्दभाग्य पतिहीना कोरेछे बिधाता।।
धनबान छिल पिता मोर पति आर।
लक्ष्मी बांधा अंगनेते सतत आमार।।
सोनार संसार मोर छिल चारिभिते।
पुत्र पुत्रबधू छिल आमारे सेविते।।
पति हल स्वर्गबासी सुखैश्वर्य जत।
एके एके जाहां किछु हल तिरोहित।।
भिन्न भिन्न हाँड़ि सब होयेछे एखन।
अविरत बधू जत कोरे ज्वालातन।।
असह्य होयेछे एबे तादेर यंत्रणा।
ए जीबन बिसर्जिते कोरेछि बासना।।
बृद्धा बाक्ये नारायणी कोहेन तखन।
आत्महत्या महापाप शास्त्रेर बचन।।
फिरे जाओ घरे तुमि कोर लक्ष्मीब्रत।
सर्व दुख बिमोचित पाबे सुख जत।।
गुरुबारें संध्याकाले बधूगण साथे।
लक्ष्मीब्रत कोर सबे हरष मनते।।
पूर्ण घटे दिबे शुधु सिन्दुरेर फোঁटा।
आम्रशाखा दिबे ताहे लेये एक गोटा।।
गुयापान दिबे ताते आसन सजाये।
सिन्दुर गुलिया दिबे भक्तियुक्त होये।।
धूप दीप ज्वालाइया सेइखाने देबे।
दूर्बा लेये हाथे सबे कथा जे शुनिबे।।
लक्ष्मीमूर्ति मानसते कोरिबेक ध्यान।
ब्रतकथा श्रवणांते शान्त कोरे प्राण।।
कथा अन्ते भक्तिभरे प्रणाम कोरिबे।
अतःपर एयोगण सिन्दुर पराबे।।
प्रति गुरुबारें पूजा जे रमणी कोरे।
निष्पाप होइबे से कमलार बरे।।
बार मास पूजा होय जे गृहेते।
अचला थाकेन लक्ष्मी सेइ से स्थानते।।
पूर्णिमा उदय होय यदि गुरुबारें।
जेइ नारी एइ ब्रत कोरे अनाहारे।।
कमला बासना तार पुरान अचिरे।
महासुखे थाके सेइ सेइ पुत्रपरिबारे।।
लक्ष्मीर हाँड़ि एक स्थापिया गृहेते।
तण्डुल राखिबे दिन मुठा प्रमाणेते।।
एइ रूपे नित्य जेबा संचय कोरिबे।
असमये उपकार ताहार होइबे।।
सेथाय प्रसन्ना देवी कोहिलाम सार।
जाओ गृहे फिरे कोर लक्ष्मीर प्रचार।।
कथा शेष कोरे देवी निज मूर्ति धरे।
बृद्धारे दिलेन देखा अति कृपा भरे।।
लक्ष्मी हेरि बृद्धा आनंदे बिभोर।
भूमिष्ठ प्रणाम कोरे आकुल अंतर।।
ब्रत प्रचारिया देवी अदृश्य होइल।
आनन्द हिल्लोलें भेसे बृद्धा घरे गेल।।
बधूगणे आसि बृद्धा बर्णना कोरिल।
जे रूपेते बनमाझे देबीरे हेरिल।।
ब्रतेर पद्धति जाहां कोहिल सबारे।
नियम जा किछु लक्ष्मी बोलेछे ताहारे।।
बधूगण एक होये कोरे लक्ष्मीब्रत।
स्वार्थ द्वेष हिंसा जत होइल दूरित।।
ब्रतफले एक हल सप्त सहोदर।
दुख कष्ट घुचे जाय अभाब सत्वर।।
कमला आसिया पुनः आसन पातिल।
लक्ष्मीहीन सेइ गृहे लक्ष्मी अधिष्ठिल।।
दैवयोगे एकदिन बृद्धार गृहेते।
आसिल जे एक नारी ब्रत समयेते।।
लक्ष्मीकथा शुनि मन भक्तिते पुरिल।
लक्ष्मीब्रत कोरिबे से मानत कोरिल।।
कुष्ठरोगग्रस्त पति भिक्षा कोरि खाय।
ताहार आरोग्य आशे पूजे कमलाय।।
भक्तिभरे एयो लेये जाय पूजिबारे।
कमलार बरे सब दुख गेल दूरे।।
पतिक आरोग्य हल जन्मिल तनय।
ऐश्वर्ये पुरिल तार शान्तिर आलय।।
लक्ष्मीब्रत एइ रूपे प्रति घरे घरे।
प्रचारित होइल जे अवन्ती नगरे।।
अतःपर शुन एक अपूर्ब घटन।
ब्रतेर माहात्म्य किसे होय प्रचलन।।
एकदिन गुरुबारें अवन्ती नगरे।
मिलि सबे एयोगण लक्ष्मीब्रत कोरे।।
श्रीनगरबासी एक बनिक नन्दन।
दैवयोगे सेइ देशे उपनीत होन।।
लक्ष्मीपूजा हेरि कोहे बनिक तनय।
कोहे, ए कि पूजा कोर, किबा फल होय।।
बनिकेर कोथा शुनि बोले नारीगण।
लक्ष्मीब्रत इहा इथे मानसपूर्ण।।
भक्तिभरे जेइ नर लक्ष्मीब्रत कोरे।
मनेर आशा तार पुरिबे अचिरे।।
सदागर एइ शुनि बोले अहंकारे।
अभागी जनते हाय पूजे हे उहारे।।
धनजनसुख जत सब आछे मोर।
भोगेते सदाइ आमि रहि निरंतर।।
भाग्ये ना थाकिले लक्ष्मी दिबे किबा धन।
एकथा बिश्वास कभु कोरि ना एमान।।
हेन बाक्य नारायणी सहिते ना पारे।
अहंकार दोषे देवी त्यजिला ताहारे।।
बैभबते पूर्ण तरी बाणिज्येते गेले।
डुबिल बाणिज्यतरी सागरेर जले।।
प्रासाद संपद जत छिल तार।
बज्र संगे होये गेल सब छारखार।।
भिक्षाझुलि स्कन्धे कोरि फिरे द्वारे द्वारे।
क्षुधार ज्वालाय घोरे देश देशांतरे।।
बनिकेर दशा जेइ मा लक्ष्मी देखिल।
कमला करुणामयी सकलि भूलिल।।
कौशल कोरिया देवी दुख घुचाबारे।
भिक्षाय पाठान तारे अवन्ती नगरे।।
हेरि सेथा लक्ष्मीब्रत रता नारीगणे।
बिपद कारण तार आसिल स्मरणे।।
भक्तिभरे करजोड़ें होये एकमन।
लक्ष्मीर बन्दना कोरे बनिक नन्दन।।
क्षमा कोर मोरे मागो सर्व अपराध।
तोमारे हेला कोरि जत परमानाद।।
अधम संताने मागो कोर तुमि दया।
संतान कांदिया मरे दाओ पदछाया।।
जगत जननी तुमि परमा प्रकृति।
जगत ईश्वरी तबे पूजि नारायणी।।
महालक्ष्मी माता तुमि त्रिलोक मण्डले।
गृहलक्ष्मी तुमि मागो होओ गो भूतले।।
रास अधिष्ठात्री तुमि देवी राशेश्वरी।
तब अंशभूता जत पृथिबीर नारी।।
तुमिइ तुलसी गंगा कलुषनाशिनी।
शारदा विज्ञानदात्री त्रितापहारिणी।।
स्तव कोरे एइ रूपे भक्तियुक्त मने।
भूमेते पड़िया साधु प्रणमे से स्थाने।।
ब्रतेर मानत कोरि निज गृहे गेल।
गृहिणीरे गृहे गिया आद्यन्त कोहिल।।
साधु कथा शुनि तबे जत नारीगण।
भक्तिभरे कोरे तारा लक्ष्मीर पूजन।।
सदय हलेन लक्ष्मी ताहार उपरे।
पुनराय कृपादृष्टि देन सदागरे।।
सप्ततरी जल होते भासिया उठिल।
आनन्देते सकलेर अंतर पुरिल।।
दारिद्र अभाब दूर होइल तखन।
आबार संसार हल शान्ति निकेतन।।
एइ रूपे ब्रतकथा मर्त्येते प्रचार।
सदा मने रेखो सबे लक्ष्मीब्रत सार।।
एइ ब्रत जेइ जने कोरे एक मने।
लक्ष्मीर कृपाय सेइ बाड़े धने जने।।
करजोड़ कोरि सबे भक्तियुक्त मने।
लक्ष्मीरे प्रणाम कोर जे थाक जेखाने।।
ब्रतकथा जेबा पड़े जेबा राखे घरे।
लक्ष्मीर कृपाय तार मनोबांछा पुरे।।
लक्ष्मीर ब्रतेर कथा बड़ो मधुमय।
प्रणाम कोरिया जाओ जे जार आलय।।
लक्ष्मीब्रतकथा हेथा होइल समापन।
आनन्द अंतरे बल लक्ष्मी-नारायण।।
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