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अलिफ लैला – तीसरे फकीर की कहानी

Alif laila teesare Fakir ki Story In Hindi

खलीफा की आज्ञा के बाद जुबैदा ने अपनी कहानी सुनाते हुए बताया कि आपने मेरे घर पर उस दिन जो दो काले जानवर देखे थे, वो मेरी सगी बहनें हैं। ये दोनों जो साथ में आई हैं, वो मेरी सौतेली बहने हैं। काले निशान जिसके शरीर में आपने देखे, वो अमीना है। उसके साथ जो दूसरी बहन है उसका नाम साफी है और मेरा नाम जुबैदा है। सबसे पहले मैं आपको बताऊंगा कि मेरी सगी बहनें जानवर कैसे बन गईं। इसी में मेरे सारे जीवन की कहानी छुपी है।

अपनी बहनों का किस्सा सुनाते हुए जुबैदा ने बताया कि मेरे पिता के मरने के बाद सौतेली बहनें अपनी मां के साथ और हम लोग अपनी मां के साथ रहने लगे। सभी बहनों को दोनों मांओं ने पिता जी के पैसे बराबर बांट दिए थे, ताकि आगे सबके काम आ सके। कुछ समय बीतने के बाद मां ने मेरी दोनों सगी बहनों की शादी कर दी और वो अपने ससुराल चली गईं। फिर मैंने मां से मिले पैसों से कपड़ों का व्यापार शुरू किया और मां के साथ खुशी-खुशी रहने लगी।

तभी एक दिन मेरी बड़ी दीदी के पति ने अपना सब कुछ बेचकर विदेश जाने का फैसला लिया। उन्होंने दीदी को समझाकर उनके सारे पैसे भी ले लिए और उन्हें लेकर विदेश चले गए। भले ही वो विदेश व्यापार करने के लिए गए थे, लेकिन अपनी बुरी आदतों के कारण सारे पैसे लड़कियों और दूसरी चीजों पर लुटा दिए। धीरे-धीरे उसने मेरी बड़ी दीदी के सारे गहने भी बेच दिए और आखिर में उन्हें तलाक देकर छोड़ दिया।

मेरी बड़ी दीदी किसी तरह से विदेश से यहां बगदाद मेरे पास वापस आईं। मैंने उससे उसकी हालत के बारे में पूछा, तो उसने सब बता दिया। मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने उसे हमेशा मेरे साथ रहने के लिए कहा। मेरा रेशम के कपड़ों का व्यापार अच्छा चल रहा था, इसलिए पैसों की कोई कमी नहीं थी। धीरे-धीरे मेरी बहन भी मेरे साथ काम करने लगी और हम खुशी-खुशी रह रहे थे।

फिर अचानक एक दिन दूसरी दीदी भी दुखी और परेशान हालत में घर आ गई। उसके पति ने भी उसका सारा पैसा खत्म करके उसे तलाक दे दिया था। मैंने उसे भी अपने साथ रखा और हम तीनों एक साथ व्यापार करने लगे। एक दिन दोनों दीदी ने दोबारा शादी करने की बात कही। उनके दिमाग में था कि उनकी वजह से मेरा ज्यादा पैसा खर्च हो रहा है। मैंने उनसे कहा कि मुझे परेशानी हो रही है यह सोचकर शादी करना सही ख्याल नहीं है। हम लोग साथ में मिलकर अच्छा व्यापार कर रहे हैं, तो पैसों की कोई कमी नहीं है। आप दोनों आराम से यहां जिंदगी भर रह सकती हैं।

मैंने उन्हें यह भी बताया कि एक बार जब वो शादी में इतने दुख झेल चुकी हैं, तो दोबारा शादी के बारे में नहीं सोचना चाहिए। इतना सब कहने के बाद भी दोनों ने मेरी बात नहीं सुनी और विवाह करने की जिद पर अड़ी रहीं। उन्होंने आगे कहा कि तुम हमें बेचारी समझती होंगी, इसलिए हम यहां से जाना चाहती हैं। यह सुनकर मुझे दुख हुआ और मैंने दोनों को गले से लगाया और रोते हुए कहा कि आप दोनों मेरी दीदी हैं और मैं आप लोगों का मां जैसा सम्मान करती हूं।

दोनों के दिल को राहत मिली और वो मेरे साथ आराम से रहने लगीं। तीनों की मेहनत के कारण व्यापार और भी अच्छा चलने लगा, इसलिए मैंने व्यापार को दूसरे नगर तक बढ़ाने के बारे में सोचा। इसी सोच के साथ मैं अपनी बहनों के साथ बगदाद से अपने रेशम के कपड़े लेकर जहाज में बैठ गई। बीस दिनों बाद एक टापू पर जहाज पहुंचा, जहां हम सभी कुछ देर के लिए रूक गए। उसके पास ही एक सुंदर सा नगर था। मैं उस नगर को देखने के लिए अकेले ही आगे चली गई। उस नगर के बाहर बहुत से सिपाही थे। वो बिल्कुल भी नहीं हिल रहे थे और दिखने में बहुत भयानक थे।

मैं डरते-डरते आगे बढ़ गई। पास पहुंची, तो पता चला कि वो सारे सिपाही पत्थर के बने हुए थे। फिर मैं अंदर जाने लगी, लेकिन वहां भी सब कुछ पत्थर का था। वहां न बाजार खुला था न किसी के घर से कोई आवाज आ रही थी। मैं समझ गई कि किसी वजह से इस शहर के सभी लोग और चीजें पत्थर की बन गई हैं। कुछ देर बाद मुझे पास में ही एक बड़ा सा मैदान दिखा। मैं उधर जाने लगी, तो वो राजमहल सा दिखा और उसके अंदर भी सब कुछ पत्थर का ही था। वहां कई सारे सुंदर कमरे थे, लेकिन एक कमरे का दरवाजा सोने का बना हुआ था। मैं उसके अंदर गई। वहां एक महिला थी, जिसका शरीर पत्थर का बन चुका था। उसके सिर पर मुकुट और गले में बेशकीमती गहने थे। मैं समझ गई कि वो महारानी होंगी।

कुछ दूर चलने पर एक बड़ा सा सोने का सिंहासन जैसा कुछ दिखा और उसके ऊपर से तेज रोशनी आ रही थी। मैंने ऊपर चढ़कर देखना चाहा कि वो क्या है। जैसे ही मैंने ऊपर हाथ बढ़ाया, तो पाया कि उधर हीरा रखा हुआ है, जिससे रोशनी निकल रही थी। मैं नीचे उतर गई थोड़ा आगे बढ़ने पर एक चलता हुआ दीप दिखा। यह देखकर मुझे लगा कि जरूर यहां कोई इंसान है, क्योंकि दीप ऐसे ही नहीं जलता। इन सबके बीच में इतना उलझ गई कि मेरे दिमाग से यह बात ही निकल गई कि जहाज में मेरा सामान और बड़ी बहनें हैं।

थोड़ी ही देर में रात हो गई। अंधेरे में मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर मैं जहां से हीरे की रोशनी आ रही थी वहां चली गई। मैंने वहां सोने की कोशिश की लेकिन पत्थर के बने इंसानों के बारे में सोच-सोचकर नींद नहीं आ रही थी। फिर अचानक कही से कुरान की आवाज आने लगी। मैं पास में ही रखा दीप उठाकर उस आवाज की ओर चलने लगी, क्योंकि मुझे यह जानना था कि जहां सब कुछ पत्थर का बन गया है, वहां कौन कुरान पड़ रहा है।

चलते-चलते मैं उस कमरे तक पहुंच गई जहां से आवाज आ रही थी। वहां एक मस्जिद बनी हुई थी, जिसके पास दीप जलाए हुए एक लड़का कुरान पाठ कर रहा था। मैंने भी वहां कुछ देर माथा टेका और भगवान को धन्यवाद दिया। उस लड़के ने जैसे ही मुझे देखा, तो हैरान हो गया। उसने मेरा नाम पूछा, मैंने उसे अपने और अपनी यात्री के बारे में विस्तार से बताया।

फिर मैंने उस लड़के से उस सुनसान नगर और पत्थर से बने लोगों के बारे में पूछा। उसने बताया कि वो उस राज्य का शहजादा है और इस राज्य में भगवान का प्रकोप हुआ, जिस वजह से सब लोग पत्थर के बन गए। मैं सबसे ज्यादा भगवान पर विश्वास करता था, इसलिए मेरे अलावा पूरा राज्य पत्थर का हो गया। तब मेरी श्रद्धा भगवान के प्रति और बढ़ गई। इसी वजह से रोज मैं भगवान व अल्लाह को धन्यवाद कहता है।

मैं उसकी बात सुनकर दुखी हो गई। तब मैंने उस युवक को अपने साथ बगदाद आने का न्योता दिया। मैंने कहा कि व्यापार के लिए मेरा कुछ सामान जहाज में है। आप भी मेरे साथ चलिए मैं व्यापार का सामान बुशहर में पहुंचा दूंगा। उसके बाद आप मेरे घर बगदाद में चलना। आप अच्छे व्यक्ति है, इसलिए हमारे खलीफा आपको जरूर कोई-न-कोई काम दे देंगे। मेरी बात सुनकर वो लड़का मेरे साथ चलने को राजी हो गया। हमने उस नगर की कुछ बेशकीमती चीजें एक अन्य जहाज में रख ली। फिर हम दोनों उसी जहाज में सवार हो गए, जिससे में उस जगह तक पहुंची थी।

मेरी बहनों ने शहजादे और मुझे देखकर पूछा कि यह कौन है और तुम कहा थी रातभर। मैंने उसे सारा किस्सा सुना दिया। फिर मेरी दोनों दीदी ने पूछा कि यह शहजादा कहा रहेगा और तुम इसके साथ क्या करोगी। मजाक-मजाक में मैंने कह दिया कि मैं इसके साथ शादी करके इसकी सेवा करूंगी। मेरे मजाक में शहजादे ने भी पूरा साथ दिया। मेरी बड़ी बहनें शहजादे और मेरी बातें सुनकर जलने लगीं। वह शहजादा काफी सुंदर था, जिस वजह से उन्हें मन-ही-मन मुझसे और गुस्सा आने लगा।

दो दिन बाद हम बुशहर पहुंचने वाले ही थे, लेकिन मेरी बहनों ने कुछ ऐसा किया की सब कुछ बदल गया। उस रात जब हम गहरी नींद में थे, तभी दोनों बहनों ने मुझे और उस शहजादे को समुद्र में फेंक दिया। मुझे तैरना आता था, इसलिए किसी तरह से वहां से बचकर निकल गई पर शहजादा उसी समय पानी में डूब गया। मैं सीधे तैरकर एक टापू में आ गई। मैंने किसी तरह अपने कपड़े सुखाए और आराम करने के लिए पेड़ पर चढ़ गई।

तभी मैंने एक अनोखा सांप देखा। उसके तीन चार पर थे और वो बहुत तेजी से इधर-उधर भाग रहा था। मैंने आसपास नजर दौड़ाई, तो देखा कि उसके पीछे एक बड़ा-सा सांप था। किसी तरह से मैंने उस अनोखे सांप को बड़े सांप से बचाया। इतने में वो सांप हवा में उड़ने लगा। यह देखकर मैं हैरान रह गई। कुछ देर बाद ही मेरे बगल में एक परी आकर बैठ गई। मैंने उससे पूछा तुम कौन हो? जवाब में उसने कहा कि मैं वही सांप हूं, जिसे तुमने बचाया था। मैं रूप बदलकर सांप के भेष में घूम रही थी, तभी तुमने मेरी जान बचाई।

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आगे परी ने कहा कि वो मेरे साथ जहाज में हुए किस्से को जानती है। उसने आगे बताया कि जब तूमने मेरी जान बचाई, तो उसके बाद मैं उसी जहाज में गई और तुम्हारी दोनों बहनों को उनके गलत काम की सजा दी। तुमने उनकी पूरे मन से सेवा की, लेकिन उन्होंने तुम्हारे साथ गलत व्यवहार किया। ऐसे में मैंने और मेरे परी लोक की कुछ परियों ने मिलकर तुम्हारी दोनों बहनों को काला जानवर बना दिया है। उस जहाज में जितना भी सामान था हमने अपनी शक्ति से तुम्हारे घर पहुंचा दिया।

फिर उस परी ने अपनी शक्ति से मुझे और मेरी बहनें जो जानवर बन गई थीं, सबको एक साथ घर पहुंचा दिया। हमें घर पहुंचाकर उस परी ने कहा कि तुम्हारी बहनों की सजा अभी पूरी नहीं हुई है। रोज तुम इन्हें सौ बार मारोगी। अगर तुमने ऐसा नहीं किया, तो तुम्हारा सारा व्यापार बर्बाद हो जाएगा। इसी वजह से मैं रोज इन्हें मारती हूं और ये मेरी बड़ी बहनें हैं, इसलिए मुझे रोना आ जाता है।

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