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अलिफ लैला – अबुल हसन और हारूं रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी

बादशाह का आदेश पाकर शहरजाद ने अबुल हसन और हारूं रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी शुरू की, जो कुछ इस प्रकार है:

बगदाद में खलीफा हारूं रशीद के राजकाल में एक अमीर और अच्छे संस्कारों वाला कारोबारी रहता था। वह दिखने में सुंदर होने के साथ-साथ मन से भी अच्छा व्यक्ति था। बगदाद के लोग उसका बड़ा मान-सम्मान करते थे। अन्य लोगों के साथ-साथ खलीफा के महल के लोग भी उसका बड़ा आदर करते थे। महल की सभी खास सेविकाएं उसी के यहां से कपड़ों और गहनों की खरीदारी किया करती थीं। वहीं, अबुल हसन नामक एक व्यक्ति उस व्यापारी का दोस्त था। अबुल हसन बका नामक एक अमीर व्यक्ति का बेटा था। बका फरस का अंतिम राजकुल था, इसलिए उसके बेटे अबुल हसन को लोग शहजादा कहते थे।

अबुल हसन दिखने में बहुत ही सुंदर युवक था। उसे गाने और कविताएं सुनाने का बड़ा अच्छा हुनर था। जब भी उसे वक्त मिलता, तो वह अपने व्यापारी दोस्त के दुकान में ही गाना-बजाना शुरू कर देता था और उसका गाना सुनने के लिए दुकान पर लोगों की भीड़ जमा हो जाती थी।

एक दिन जब शहजादा अबुल हसन अपने व्यापारी दोस्त की दुकान पर बैठा था। उसी वक्त एक स्त्री वहां अपनी सेविकाओं के साथ आई। उसने खूबसूरत कपड़े और जेवर पहने थे और वह दिखने में भी उतनी सुंदर थी। वह उस व्यापारी के यहां कुछ सामान खरीदने आई थी। व्यापारी उसे देखते ही उसके पास गया और सम्मान पूर्वक उसे दुकान के अंदर लेकर आया। व्यापारी ने उस स्त्री को एक खूबसूरत कमरे में बैठने को कहा। शहजादा अबुल हसन भी उस स्त्री के लिए एक छोटी चौकी लेकर आया, जिसपर उस युवती ने अपने पांव रखें।

यह सब देखकर वह स्त्री समझ गई थी कि यह जगह उसके लिए सुरक्षित है और इसलिए उस युवती ने अपने चेहरे का नकाब हटा दिया। जैसे ही उसने अपना नकाब हटाया, शहजादा अबुल हसन उसे बस देखता ही रह गया। वह बहुत ही सुंदर थी, वहीं वह स्त्री भी शहजादे को देखकर आकर्षित हो गई। पहली ही बार में उन दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया। उस स्त्री ने शहजादे अबुल को वहां बैठने के लिए कहा। अबुल हसन ने उसकी बात मान ली और वहां उसके पास बैठ गया, लेकिन वह बिना पलकें झपकाएं सिर्फ उसे देखता ही जा रहा था।

शहजादे की ऐसी हालात देखकर वह समझ गई थी कि उसे भी उससे प्यार हो गया है। इसके बाद युवती व्यापारी के पास जाकर खरीदारी करने लगी और फिर बातों-बातों में व्यापारी से उस युवक का नाम-पता पूछने लगी। व्यापारी ने उस स्त्री के पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए कहा कि ‘इस नौजवान का नाम अबुल हसन है। यह एक अमीर व्यक्ति बका का बेटा है। इसके दादा ईरान के अंतिम बादशाह थे। इसके खानदान की कई लड़कियों की शादी खलीफा के कुल में हुई है।’ व्यापारी की इन बातों को सुनकर और यह जानकर कि वह युवक राज घराने से है, वह बहुत खुश हुई। उसने व्यापारी से कहा, ‘मुझे यह अच्छे संस्कारों का युवक लगता है। आपकी मदद से मुझे इससे दोबारा मिलने की उम्मीद है। मैं अपनी एक खास सेविका को आपके पास भेजूंगी। उस वक्त आप इस युवक को अपने साथ मेरे यहां लेकर आना। अगर आप इसे लेकर आएंगे, तो मैं आपकी आभारी रहूंगी।’

यह सब सुनकर वह व्यापारी समझ गया कि वह भी शहजादे से प्रेम करने लगी है। उसने युवती को भरोसा दिलाया कि वह शहजादे को महल में लेकर आएगा। इसके बाद वह खूबसूरत स्त्री वहां से चली गई। वहीं, शहजादा उसे जाते देख देखता ही रह गया। शहजादे की ऐसी हालत देखकर व्यापारी ने उससे पूछा कि ‘भाई, क्या हो गया है तुम्हें? आस-पास के लोग तुम्हारी ऐसी हालत देखकर कई तरह की बातें बना सकते हैं।’

व्यापारी की बात सुनकर शहजादे ने कहा, ‘दोस्त, अगर तुम मेरे मन की हालत जानते, तो शायद ऐसा नहीं कहते। जब से मैंने उसको देखा है, मैं सिर्फ उसी के बारे में सोच रहा हूं। अब मेहरबानी करके तुम मुझे उसका नाम और पता बता दो।’ यह सुनकर व्यापारी ने कहा, ‘मेरे दोस्त, उसका नाम शमसुन्निहार है। वह खलीफा की सबसे प्रिय सेविका है।’

उस व्यापारी ने शहजादे को समझाने की कोशिश की। उसने कहा, ‘शमसुन्निहार को खलीफा बहुत मानते हैं। उन्होंने मुझे आदेश दिया हुआ है कि शमसुन्निहार को जिस भी वस्तु की आवश्यकता हो, मैं वह चीज उसे तुरंत दूं।’ शहजादे को सावधान करते हुए व्यापारी ने बताया कि अगर खलीफा को इस बारे में पता चला तो जान का भी खतरा हो सकता है। इतना सुनने के बाद भी अबुल हसन पर कुछ असर नहीं हुआ और वह शमसुन्निहार को याद करता रहा।

इन सबके बीच एक दिन व्यापारी के दुकान पर एक खास सेविका आई। उसने धीरे से उस व्यापारी से कहा कि ‘मालकिन आपसे और शहजादे अबुल से मिलना चाहती है, इसलिए उन्होंने आप दोनों को बुलाया है।’ यह सुनकर वे तुरंत सेविका के साथ जाने के लिए निकल गए। शमसुन्निहार खलीफा के बड़े राजमहल के एक कोने में मौजूद एक बड़े से कमरे में रहती थी। दासी दोनों को एक गुप्त दरवाजे से महल ले गई। महल में ले जाने के बाद उसने दोनों को एक खूबसूरत जगह पर बैठने को कहा और उनका खूब आदर-सत्कार किया और उन्हें कपड़ों पर लगाने के लिए सुंगधित इत्र भी दिए।

इसके बाद एक खास सेविका दोनों को एक सुंदर बैठक में ले गई। वह जगह बहुत ही सुंदर और आकर्षक थी। वहीं दूसरी तरफ के खंभों के बीच में एक दरवाजा लगा था, जिसके बाद खूबसूरत बरामदा और बगीचा था।

वे लोग महल की खूबसूरती का आनंद ले ही रहे थे कि कुछ सेविकाएं वहां आकर बैठ गईं और कई तरह के गाने-बजाने वाले यंत्रों को तैयार करने लगी। बगीचे में दोनों को ऐसे स्थान पर बैठाया गया था, जहां से वे सब कुछ देख सके। इसी बीच उन दोनों ने दूसरी ओर ऊंची चौकी देखी, जो महंगे रत्नों से जड़ी हुई थी। उसे देखकर व्यापारी ने धीरे से शहजादे को कहा, ‘शायद यह बड़ी चौकी शमसुन्निहार के बैठने के लिए है। खलीफा के सभी सेविकाओं में सिर्फ शमसुन्निहार को ही इजाजत है कि वह अपनी मर्जी से जहां चाहे वहां जा सकती है। इतना ही नहीं जब भी खलीफा को शमसुन्निहार से मिलना होता है, तो वह खुद पहले से अपने आने की जानकारी देते हैं।’

व्यापारी और शहजादा आपस में बात कर ही रहे थे कि तभी एक सेविका ने वहां आकर गाना-बजाना शुरू करने का आदेश दिया। शहजादा संगीत का आनंद ले ही रहा था कि तभी सेविकाओं ने शमसुन्निहार के आने का एलान किया। सबसे पहले शमसुन्निहार की खास सेविका आई और फिर दरवाजे पर रक्षक सेविकाएं हथियार लेकर शमसुन्निहार के स्वागत में खड़ी हो गई।

कुछ ही देर में शमसुन्निहार आती है और अपनी चौकी पर बैठ जाती है। उसने सिर से पांव तक हीरे-मोतियों से जड़े गहने पहने थे। बैठने के बाद उसने सेविकाओं को आदेश दिया कि वे अपनी कला का प्रदर्शन करें।

शमसुन्निहार के कहने पर उन लोगों ने गीत गाना शुरू किया। उनके गीत शहजादे और शमसुन्निहार की हालत को बखूबी व्यक्त कर रहे थे। जिसके बाद शहजादे ने भी बांसुरी ले ली और बहुत देर तक उसे बजाता रहा। जब उसने बांसुरी बजाना बंद किया, तो शमसुन्निहार ने वही बांसुरी ली और दिल पर असर करने वाली एक धुन निकाली। फिर शहजादे ने एक वाद्य यंत्र लिया और एक मन को लुभाने वाला संगीत बजाने लगा। अब माहौल कुछ ऐसा हो गया कि शहजादा और शमसुन्निहार एक-दूसरे से अलग नहीं रह पा रहे थे। थोड़ी देर बाद दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया, लेकिन खुशी से अचानक दोनों बेहोश हो गए।

वहां मौजूद सेविकाओं ने दौड़ कर दोनों को संभाला और उन्हें होश में लाया। होश में आते ही शमसुन्निहार ने व्यापारी के बारे में पूछा कि वह कहां है। बेचारा वह व्यापारी अपनी जगह में बैठकर डर के मारे कांप रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अगर इसके बारे में खलीफा को पता चला तो क्या होगा। व्यापारी यह सोच ही रहा था कि तभी शहजादा व्यापारी के पास आकर बोला कि शमसुन्निहार ने उसे याद किया है। जब वह शमसुन्निहार के पास गया, तो शमसुन्निहार ने कहा कि ‘मैं आपकी एहसानमंद हूं कि आपने मुझे शहजादे से मिलवाया।’ व्यापारी ने कहा, ‘मैं इस बात से अचंभित हूं कि आप दोनों एक-दूसरे से मिलने के बाद भी इतने बेचैन क्यों हैं।’ शमसुन्निहार ने व्यापारी को जवाब देते हुए कहा कि ‘सच्चे प्यार करने वालों की यही हालत होती है, उन्हें बिछड़ने का दुख तो सताता ही है, मिलने से भी उनका मन बेचैन होता है।’

इतना सबकुछ होने के बाद शमसुन्निहार सेविकाओं को सबके लिए भोजन लाने को कहा। सबने तसल्ली से खाना खाया, फिर शमसुन्निहार ने शरबत का गिलास लिया और गाना गाते हुए उसे पी गई। वहीं, दूसरा गिलास उसने शहजादे को दिया और शहजादे ने भी एक गीत गाते हुए शरबत पी लिया।

इसी बीच एक सेविका ने शमसुन्निहार को खलीफा के सेवक मसरूर के आने की खबर दी। उसने कहा कि ‘मसरूर खलीफा का संदेश लेकर आया है।’ शहजादा और व्यापारी यह बात सुन कर डर गए। शमसुन्निहार ने उन्हें भरोसा दिया और सेविका से मसरूर को बातों में उलझाए रखने को कहा ताकि वह शहजादे और व्यापारी को छुपा सके। इसके बाद शमसुन्निहार ने शहजादे और व्यापारी को ऐसी जगह छिपा दिया जहां उन्हें कोई देख न सके। उसके बाद उसने मसरूर को बुलाने की इजाजत दी।

मसरूर अपने सेवकों के साथ अंदर आया और शमसुन्निहार के सम्मान में झुककर उसे सलाम किया। मसरूर ने बताया कि खलीफा शमसुन्निहार से मिलना चाहते हैं। शमसुन्निहार खुश हुई और बोली, ‘यह तो मेरी खुशकिस्मती है कि वे मुझसे मिलना चाहते हैं, मैं तो उनकी सेविका हूं। वह जब मन तब आ सकते हैं, लेकिन मसरूर जी, आप उन्हें कुछ देर बाद लेकर आएं क्योंकि मैं नहीं चाहती कि जल्दबाजी में खलीफा के स्वागत में कुछ कमी रह जाए।’

इतना कहकर शमसुन्निहार ने जैसे-तैसे मसरूर और उसके सेवकों को भेज दिया और नम आंखों से शहजादे के पास आ गई। शमसुन्निहार के आंखों में आंसू देख व्यापारी घबरा गया, उसे लगा कि कहीं उनका राज सबको पता तो नहीं चल गया। शहजादा भी काफी परेशान था। इसी बीच शमसुन्निहार की एक सेविका ने कहा कि ‘ खलीफा के सेवक आने लगे हैं और अब खलीफा किसी भी वक्त वहां आ सकते हैं।’

शमसुन्निहार ने रोते हुए सेविका से उन दोनों को बाग के दूसरे कोने में बने घर में ले जाने को कहा। फिर मौका मिलते ही उन्हें खुफिया रास्ते से दजला नदी के किनारे ले जाकर नाव पर बैठा देने को कहा। यह कह कर उसने शहजादे को गले लगा कर विदा किया।

सेविका ने दोनों को उस मकान में बंद का दिया। वे दोनों काफी देर तक उस मकान में इधर-उधर देखते रहे कि शायद उन्हें वहां से निकलने का कोई रास्ता मिले, लेकिन उन्हें कोई रास्ता नहीं मिला। अचानक उन्होंने खिड़की से देखा कि खलीफा के अंगरक्षक बगीचे में आ रहे हैं, साथ ही खलीफा का मुख्य सेवक मसरूर भी था। यह देख वो दोनों काफी डर गए। दरअसल, खलीफा जब भी रात को किसी सेविका के यहां जाते थे, तो सुरक्षा का कड़ा इतेजाम किया जाता है।

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शमसुन्निहार ने अपनी सेविकाओं के साथ खलीफा का स्वागत किया। वह आगे बढ़ी और उसने खलीफा के पैरों पर सिर झुकाकर सम्मान किया। खलीफा ने उसे गले लगाया और कहा, ‘तुम मेरे पैर मत पड़ो, बल्कि मेरे पास बैठो ताकि मैं तुम्हें देख सकूं।’ शमसुन्निहार खलीफा के पास बैठ गई और एक गाने वाली को इशारा कर गाने को कहा। उसने एक जुदाई का गीत गाना शुरू कर दिया। खलीफा को लगा कि यह उनके न रहने से शमसुन्निहार अपने दुख को इस गीत के जरिए जता रही है, लेकिन सच तो यह था कि वह गाना शमसुन्निहार और शहजादे के बिछड़ने के दुख की कहानी बयां कर रहा था।

गाना सुनकर शमसुन्निहार को चक्कर आ गया और वह नीचे गिर पड़ी। सेविकाओं ने दौड़ कर उसे संभाला। वहीं शहजादा भी उधर गीत सुन कर दुखी होकर बेहोश हो गया, लेकिन व्यापारी ने उसे संभाल लिया। थोड़ी ही देर में वह सेविका व्यापारी के पास आकर शमसुन्निहार का हाल बताई और उन्हें वहां से चले जाने को कहा। यह सुनकर व्यापारी ने कहा कि ‘तुम देख नहीं रही हो कि शहजादा बेहोश है, ऐसी हालत में हम बाहर कैसे जाएंगे।’ यह देख सेविका ने जल्दी से पानी और बेहोशी में सुंघानेवाली दवा दी, जिससे शहजादे को होंश आ गया।

इसके बाद सेविक उन दोनों को खुफिया रास्ते से बाहर उस दजला नदी के पास ले गई। वहां पहुंच कर सेविका ने धीरे से एक व्यक्ति को आवाज लगाई, जो नाव लेकर वहां आ गया। सेविका ने दोनों को नाव पर बिठा कर विदा किया। शहजादे की हालत अब भी खराब थी। व्यापारी उसे खुद को संभालने को कहता-समझाता। वह कहता, ‘हमलोगों को बहुत दूर जाना है, अगर इस बीच हमें किसी सिपाही ने देख लिया तो वे हमें चोर समझेंगे और हमारी जान मुसीबत में पड़ सकती है।’

बहुत डरते हुए और खुदा का नाम लेते हुए दोनों एक सुरक्षित जगह पर पहुंचे, लेकिन शहजादे की मानसिक हालत अब भी ठीक नहीं थी और उसमें चलने की भी हिम्मत नहीं थी। शहजादे की ऐसी स्थिति देखकर व्यापारी चिंता में पड़ गया। इसी बीच अचानक उसे याद आया कि यहां पास में ही उसका एक दोस्त रहता है। वह शहजादे को अपने उस दोस्त के यहां ले गया। उसके दोस्त ने उन्हें बैठने के लिए कहा और पूछा कि वे ऐसी हालत में कहां से आए रहे हैं। व्यापारी ने असली वजह को छिपाते हुए कहा, ‘एक आदमी के पास मेरे कुछ रुपए उधार थे। मुझे जब पता चला कि वह नगर छोड़ कर भाग रहा है तो मैं उसका पीछा करते हुए यहां तक आ गया। मेरे साथ यह जो आदमी है, उस भगोड़े व्यक्ति के बारे में जानता है। इसी ने उसका पीछा करने में मेरी मदद की, लेकिन अचानक बीच रास्ते में यह बीमार हो गया और वह भगोड़ा भागने में कामयाब हो गया।’

व्यापारी के मित्र ने दोनों को रातभर रहने के लिए स्थान दिया और शहजादे की देखभाल के लिए वैद्य बुलाने की सोचा। हालांकि, व्यापारी ने कहा कि ‘तुम परेशान मत हो, यह रात भर आराम से सोएगा, तो सुबह घर जा सकेगा।’ यह सुनकर दोस्त ने दोनों को सोने को कहकर वहां से चला गया। वहीं, शहजादे की हालत ठीक न होने के कारण उसे जल्दी ही नींद आ गई, लेकिन थोड़ी ही देर में उसने सपना देखा कि शमसुन्निहार बेहोश हो कर खलीफा के पैरों पर गिर गई है। वह अचानक जागकर रोने लगा। जैसे-तैसे रात बीती और सुबह होते ही व्यापारी ने दोस्त से विदा लिया और शहजादे को अपने साथ अपने घर ले आया। अपने लिए घरवालों की चिंता देख उसने बहाना बना दिया कि काम के सिलसिले में उसे अचानक बाहर जाना पड़ गया था।

शहजादा कुछ दिनों तक व्यापारी के घर पर ही रहा, फिर कुछ दिनों बाद शहजादे के रिश्तेदार आए और उसे घर ले गए। विदा होते समय शहजादे ने व्यापारी से कहा कि ‘तुम मुझे शमसुन्निहार की खबर देते रहना क्योंकि मुझे उसकी फिक्र हो रही है।’ व्यापारी ने शहजादे को दिलासा दिया कि वह ठीक होगी और एक न एक दिन उसकी खास सेविका जरूर कोई समाचार लेकर आएगी।

ये सब होने के कुछ दिनों बाद व्यापारी शहजादे से मिलने उसके घर गया तो देखा कि वह बहुत बीमार था और उसके कई रिश्तेदार और वैध वहां उसके पास बैठे थे। उन्होंने व्यापारी को कहा कि हकीम ने बहुत प्रयास किया, लेकिन उसपर किसी भी दवा का असर नहीं हुआ। तभी शहजादे ने आंखें खोलीं और उसने जब अपने सामने व्यापारी को देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसे उम्मीद थी कि व्यापारी शमसुन्निहार की कोई खबर लेकर आया होगा।

शहजादे ने वहां बैठे सभी लोगों से जाने को कहा। उनके जाते ही शहजादे ने व्यापारी से कहा, ‘दोस्त, देखो शमसुन्निहार के प्यार में मेरी क्या हालत हो गई है। मेरे सारे रिश्तेदार और दोस्त मेरी हालत देखकर परेशान हैं। उन्हें मेरी हालात की असली वजह नहीं पता है। मैं उन्हें असली कारण बता भी नहीं सकता हूं, लेकिन तुम्हें देखकर मुझे बड़ी हिम्मत मिली है। क्या तुम्हारे पास शमसुन्निहार की कोई खबर है?’

व्यापारी ने उसे बताया कि शमसुन्निहार की सेविका अभी तक नहीं आई है। यह सुनकर शहजादा रोने लगा। व्यापारी ने दिलासा देते हुए कहा कि वह चिंता न करे, आज नहीं तो कल शमसुन्निहार की सेविका जरूर आएगी और कोई अच्छी खबर लाएगी। इतना कहकर व्यापारी अपने घर आ गया और घर आने पर उसने देखा कि शमसुन्निहार की सेविका उसका इंतजार कर रही है। उसने व्यापारी से शहजादे के बारे में पूछा। व्यापारी ने सारी बातें और शहजादे की हालत उसे बता दी।

सेविका ने बताया कि शमसुन्निहार की भी कुछ ऐसी ही हालत है। उसने कहा कि जब वह उनको छोड़कर महल वापस लौटी तो देखी शमसुन्निहार बेहोश थी। खलीफा भी सोच में पड़ गए कि वह क्यों बेहोश हो गई। उन्होंने सभी सेविकाओं से कारण जानना चाहा, तो सभी ने उनसे असली वजह छुपा ली। वहीं जब शमसुन्निहार के होंश में आने के बाद खलीफा ने उनसे कारण पूछा तो स्वामिनी ने झूठ बोलते हुए कहा कि वह खलीफा के आने की खुशी में बेहोश हो गई थी। यह सुनकर खलीफा को तसल्ली हुई और उसने शमसुन्निहार को आराम करने की सलाह दी और वहां से चले गए।

सेविका ने आगे कहा कि ‘उसके बाद स्वामिनी ने मुझे पास बुलाकर तुम लोगों का हाल पूछा। मैंने उन्हें आपके जाने की खबर तो दी, लेकिन शहजादे के बेहोश होने की बात नहीं बताई। रात भर मैं उन्हीं के साथ थी। वह रात भर शहजादे का नाम ले-ले कर रोती रही। सुबह खलीफा के आदेश से हकीम आया, लेकिन दवा-दारू से कोई लाभ नहीं हुआ। उल्टा उसकी हालत और भी ज्यादा खराब हो गई। दो दिन बाद जब उनकी तबियत थोड़ी ठीक हुई, तो उन्होंने मुझे तुम्हारे पास आने और शहजादे का समाचार लाने को कहा।’ व्यापारी ने कहा, ‘शहजादा बिलकुल ठीक है, किंतु शमसुन्निहार की बीमारी की बात सुन कर परेशान है। उनसे यह भी कहना कि वह खलीफा के सामने ऐसा कुछ न कह दे कि जिससे हम सब मुसीबत में फंस जाए।’

सेविका के वहां से जाने के बाद व्यापारी शहजादे के घर गया। उसने शहजादे को शमसुन्निहार की सेविका के आने की बात बताई और उसके द्वारा कही गई सारी खबर सुनाई। शहजादे ने व्यापारी को अपने यहां रात भर के लिए रोक लिया। अगली सुबह व्यापारी वापस अपने घर आया, तो कुछ ही देर बाद शमसुन्निहार की सेविका उसके पास आई और शमसुन्निहार द्वारा भेजे गए पत्र के बारे में जानकारी दी। यह सुनते ही व्यापारी सेविका को लेकर शहजादे के यहां गया और पत्र की बात बताई। शहजादा पत्र की बात सुन कर उठ बैठा। शहजादे ने सेविका से पत्र लेकर आंखों से लगाया। उस पत्र में शमसुन्निहार ने अपने बिछड़ने के दर्द के बारे में लिखा था। पत्र पढ़ने के बाद शहजादे ने उस पत्र के जवाब में एक खत लिख कर सेविका को वापस दे दिया।

यह सब होता देख व्यापारी सोच में पड़ गया कि शमसुन्निहार की सेविका अगर ऐसे ही रोज-रोज उसके यहां आएगी और उसे हर रोज शहजादे के पास जाना पड़ता रहा तो क्या होगा। शहजादा और शमसुन्निहार तो एक-दूसरे के प्यार में सब कुछ भूल चुके हैं, लेकिन अगर खलीफा को इसका पता चला तो वह किसी को नहीं छोड़ेगा। इन सब में उसका मान-सम्मान तो जाएगा ही, साथ ही उसे और उसके पूरे परिवार को जान का जोखिम भी हो सकता है। ये सब सोच कर व्यापारी ने शहर छोड़ने का मन बना लिया और किसी दूसरे शहर जाकर बसने की ठान ली।

एक दिन जब व्यापारी इन्हीं सब चिंताओं में अपनी दुकान में बैठा था, तभी उसका एक जौहरी दोस्त उससे मुलाकात करने आ गया। वह शमसुन्निहार की सेविका को अक्सर व्यापारी के पास आते देखता और दोनों को शहजादे के यहां जाते देखता था। व्यापारी को चिंता में देख वह समझ गया था कि उसे कोई परेशानी है। उसने बातों-बातों में उससे पूछ ही लिया कि खलीफा के महल की सेविका उसके यहां क्यों आती है। यह सुनकर व्यापारी डर गया। उसने टालते हुए कहा कि ‘बस कुछ वस्तुएं खरीदने आती है।’ यह सुनकर जौहरी को तसल्ली नहीं हुई और उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि इसके पीछे बात कोई और है। व्यापारी समझ चुका था कि शायद उसका जौहरी दोस्त सबकुछ समझ चुका है और उससे यह सब छुपाने का कोई फायदा नहीं है। फिर व्यापारी ने जौहरी को कसम देते हुए सारी बात बताई और अपने मन का डर भी बताया।

यह सब सुन कर जौहरी सोच में पड़ गया और वहां से चला गया। कुछ दिनों बाद जौहरी जब व्यापारी की दुकान पर फिर आया, तो उसने दुकान बंद देखी। जौहरी को समझते देर नहीं लगी कि व्यापारी किसी दूसरे शहर चला गया है। जौहरी के मन में शहजादे के लिए दया की भावना आने लगी और उसने व्यापारी की जगह खुद शहजादे की मदद करने की ठान ली। वह जौहरी शहजादे के यहां गया, शहजादे को जब पता चला कि वह एक प्रतिष्ठित जौहरी है, तो उसने उसका खूब मान-सम्मान किया। जौहरी ने कहा, ‘भले ही आपसे मैं पहली बार मिल रहा हूं, लेकिन मैं आपकी मदद करना चाहता हूं। मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूं। शहजादे ने हामी भरते हुए कहा कि ‘आपको जो पूछना है आप पूछ सकते हैं।’

जौहरी ने व्यापारी के दुकान बंद होने की बात बताई और कहा कि व्यापारी ने उससे कहा था कि वह यह शहर छोड़कर कहीं और बस जाएगा। शायद, वह सच में किसी और शहर चला गया है। इतना बताने के बाद जौहरी ने शहजादे से पूछा कि क्या उसे व्यापारी के नगर छोड़ने का कारण पता है।

जौहरी की बात सुन कर शहजादा हैरान रह गया। उसने जौहरी से पूछा कि ‘क्या तुम्हारी बात पक्की है कि व्यापारी बगदाद से चला गया है?’ जौहरी ने भी संकोच करते हुए कहा कि ‘मुझे ऐसा ही लगता है।’ जिसके बाद शहजादे ने अपने एक नौकर को व्यापारी के यहां जाने और उसके बारे में पता लगाने का आदेश दिया। कुछ देर बाद जब नौकर वापस आया, तो उसने कहा कि व्यापारी के रिश्तेदारों ने बताया है कि कुछ दिन पहले ही व्यापारी बसरा चला गया है और अब वह वहीं रहेगा। उसके बाद नौकर ने धीरे से कहा कि किसी अमीर स्त्री की सेविका शहजादे से मिलने आई है। शहजादे को समझते देर नहीं लगी कि वह स्त्री कोई और नहीं, बल्कि शमसुन्निहार की सेविका ही है। उसने उसे बुलाने को कहा और इसी बीच उसके आने से पहले जौहरी उठकर दूसरे कमरे में चला गया। सेविका ने वहां आकर शहजादे से कुछ बात की और वहां से चली गई।

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अब जौहरी एक बार फिर आ कर शहजादे के पास बैठा और कहा, ‘लगता है खलीफा के महल से आपका कोई गहरा रिश्ता है।’ शहजादा यह सुनकर चिढ़ गया और कहा, ‘क्या तुम्हें पता है कि यह जो स्त्री आई थी, कौन थी?’ जौहरी ने कहा, ‘मैं इसे और इसकी मालकिन दोनों को अच्छे से जानता हूं। यह शमसुन्निहार की सेविका है और शमसुन्निहार खलीफा की प्रिय है। यह हमेशा मेरी दुकान पर जेवर खरीदने आती है। इसे मैंने कई बार उस व्यापारी के पास भी आते-जाते देखा था।’

शहजादा यह सुन कर डर गया और बोला कि ‘मुझे सच-सच बताओ कि क्या तुम इस सेविका के यहां आने का कारण जानते हो?’ जौहरी ने व्यापारी से हुई सारी बातें बता दी और कहा, ‘व्यापारी के जाने के बाद मुझे आपकी हालत पर बहुत दया आ गई और इसलिए मैं यहां आपकी मदद करने आ गया। आप मुझपर भरोसा कर सकते हैं।’

शहजादे को उसकी बातों पर भरोसा हुआ और उसने अपनी दिल की बात जौहरी को बताई। साथ ही शहजादे ने कहा कि ‘शमसुन्निहार की सेविका ने उसे यहां बैठे देख लिया था। उसे लगता है कि तुम्हीं ने व्यापारी को शहर छोड़ने की सलाह दी है। अब मुझे लगता है कि सेविका ने यह बात शमसुन्निहार को भी बता दी होगी।’ यह सब सुनने के बाद जौहरी ने कहा, ‘मैंने व्यापारी को शहर से जाने की सलाह नहीं दी। हां, उसका मान-सम्मान बचाने के लिए मैंने उसे बसरा जाने से रोका भी नहीं।’ शहजादे ने बोला, ‘मैं तुम पर विश्वास तो कर सकता हूं, लेकिन शमसुन्निहार की सेविका को तुम पर भरोसा नहीं है।’

काफी देर बात करने के बाद जौहरी ने शहजादे से विदा लिया। वहीं, शहजादे ने सेविका को विदा करते हुए कहा था कि अगली बार वह शमसुन्निहार से पत्र लिखवाकर लाए। सेविका ने शमसुन्निहार को सारी बातें बताईं। शमसुन्निहार ने अपने मन का हाल एक लंबे पत्र के जरिए शहजादे को लिखा और उस पत्र में व्यापारी के जाने का दुख भी व्यक्त किया।

सेविका पत्र लेकर शहजादे के पास जा ही रही थी कि खत रास्ते में गिर गया। थोड़ी दूर जाने के बाद उसे इस बात का एहसास हुआ। वह वापस जब उसी रास्ते पर गई, तो जौहरी को पत्र पढ़ता हुआ देखी। उसने जौहरी से पत्र वापस देने को कहा, लेकिन उसने उसकी एक न सुनी। वह खत लेकर अपने घर आ गया और सेविका भी उसके पीछे-पीछे उसके घर आ गई। जौहरी ने पत्र एक तरफ रखते हुए सेविका को बैठने का इशारा किया।

सेविका बैठ गई और इतने में जौहरी ने कहा कि उसे पता है कि यह पत्र शमसुन्निहार ने शहजादा अबुल हसन के लिए लिखा है। यह सुनते ही सेविका डर गई। जौहरी ने कहा कि वह यह खत वह उसे रास्ते में ही दे सकता था, लेकिन उसे उससे कुछ पूछना है, इसलिए वह उसे यहां लेकर आया है। जौहरी ने पूछा, ‘तुम सच बताना कि तुमने ही शहजादे से कहा है ना कि मैंने उस व्यापारी को शहर छोड़ने के लिए उकसाया था।’ सेविका ने सब कुछ मान लिया कि उसने यह बात कही है। यह सुनते ही जौहरी बोला, ‘मैं तो खुद चाहता हूं कि अब व्यापारी की जगह मैं उनकी मदद करूं।’ उसने सेविका को भरोसा दिलाया कि वह अपनी जान जोखिम में डालकर भी उनकी मदद करेगा और उसने शमसुन्निहार से भी सारी बात बताने को कही। इतना कहकर जौहरी ने पत्र सेविका को दे दिया। साथ ही उसने कहा कि शहजादे को वह उनकी सारी बात-चीत बताए और शमसुन्निहार के पत्र के उत्तर में शहजादा जो लिखे उसे भी वह लौटते समय दिखाती जाए। जौहरी की बात मानते हुए सेविका ने ऐसा ही किया।

उसके बाद वह शमसुन्निहार शहजादे का पत्र लेकर पहुंची और उसने जौहरी के साथ हुई सारी घटना भी बताई। अगली सुबह सेविका जौहरी के पास गई और उसने कहा कि जौहरी के नेक विचार जानने के बाद शमसुन्निहार उनसे मिलना चाहती है और उन्होंने उसे महल आने को कहा।

यह सुनकर जौहरी परेशान हो गया और उसने कहा कि ‘इब्न ताहिर व्यापारी को महल में सभी जानते थे, इसलिए वह बिना रोक-टोक महल में जाता था, लेकिन उसे तो कोई नहीं जानता।’ सेविका ने उसे बहुत समझाया, लेकिन जौहरी महल में जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। सेविका शमसुन्निहार के पास गई और जौहरी के न आने का कारण बताया। शमसुन्निहार ने सेविका को कहा कि वह जौहरी के घर जाकर उससे मिलेंगी, वह उसे यह खबर दे दे।

फिर वह अपनी सेविका के साथ जौहरी के घर पहुंची, जहां जौहरी ने बड़े सम्मान से उसका स्वागत किया। शमसुन्निहार ने जैसे ही अपने चेहरे से नकाब हटाया तो जौहरी उसे देखता ही रह गया। उसकी सुंदरता देखते ही जौहरी समझ गया कि शहजादा अगर इसके प्यार में है, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। शमसुन्निहार और जौहरी ने खूब बातें की। बातों-बातों में शमसुन्निहार ने जौहरी को धन्यवाद किया और अपने मन का सारा हाल बताकर वहां से चली गई।

शमसुन्निहार के जाते ही जौहरी शहजादे के पास गया और सारी बातें बताई। जौहरी को देखते ही वह उससे शमसुन्निहार से मिलाने की विनती करने लगा। जौहरी ने कहा कि उनका राजमहल या जौहरी के घर में मिलना सही नहीं है। इसलिए, वह एक सुंदर भवन को किराए पर लेगा जहां शमसुन्निहार और शहजादा बिना किसी डर के मिल सकें। यह सब सुनने के बाद शहजादा खूब खुश हुआ।

जौहरी ने सारी बातें शमसुन्निहार की सेविका को बताई और उसे भी दोनों की मदद करने को कहा। सेविका मदद के लिए तैयार हो गई और जौहरी के साथ जाकर एक बड़ा मकान पसंद किया और वापस महल चली गई। हालांकि, वह कुछ देर बाद फिर जौहरी के पास वापस आई और उसे अशर्फियों की एक थैली दी। उसने कहा कि यह उसकी मालकिन ने दी है, ताकि जौहरी उस बड़े मकान की सजावट करवा सके। सेविका के जाने के बाद जौहरी ने अपने दोस्तों के यहां से कई सोने-चांदी के बर्तन और सजावटी सामान से उस मकान को सजा दिया।

सारा इंतजाम करने के बाद जौहरी शहजादे को लेने गया और शहजादा भी तैयार होकर जौहरी के साथ चल पड़ा। जौहरी उसे सुनसान रास्तों से होकर बड़े मकान में ले आया। शहजादा वह बड़ा मकान और उसकी सजावट देखकर काफी खुश हुआ। वहीं, दिन ढ़लते ही शमसुन्निहार अपनी खास सेविका और अन्य दासियों को ले कर वहां आ गई। शहजादा और शमसुन्निहार ने जैसे ही एक दूसरे को देखा तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दोनों के आंखों में खुशी के आंसू आ गए और वो दोनों बस एक दूसरे को देखते ही रह गए। जौहरी ने उन दोनों को धैर्य से काम लेने को कहा। उसके बाद उन लोगों ने खाना खाया और सब लोग बैठक में आ गए। इतने में शमसुन्निहार ने पूछा कि ‘यहां बांसुरी तो नहीं मिलेगी।’ जौहरी ने पहले से ही सारा इंतजाम कर रखा था। उसने एक बांसुरी ला कर उन्हें दी। शमसुन्निहार ने बांसुरी पर एक खूबसूरत धुन बजाई, जिससे उनके प्यार और बिछड़ने का सारा दर्द झलक रहा था। उसके बाद शहजादे ने भी उसके जवाब में उसी बांसुरी पर मधुर संगीत बजाया।

इसी बीच मकान के बाहर से आवाज आने लगी। तभी जौहरी का एक नौकर दौड़ता हुआ आया और बोला कि दरवाजे पर कई सारे लोग जमा हैं और वे दरवाजा तोड़ कर अंदर आने की कोशिश कर रहे हैं। आगे उसने कहा कि जब उसने उनसे पूछा कि वो लोग कौन हैं और क्या चाहते हैं, तो उन लोगों ने उसे पीटना शुरू कर दिया और वह जैसे-तैसे दरवाजा बंद कर के अंदर आ गया। यह सब सुनने के बाद जौहरी खुद बाहर दरवाजे के पास गया। उसने जैसे ही दरवाजा खोला तो देखा कि करीब सौ लोग हाथों में तलवार लिए खड़े हैं। जौहरी को लगा कि ये खलीफा के सैनिक होंगे। मौका पाते ही जौहरी पड़ोसी के घर की दीवार कूदकर उसके घर में घुस गया। वह पड़ोसी जौहरी को पहले से जानता था। उसने उसे अपने घर में छिपने की जगह दे दी।

आधी रात को जब सारा शोर खत्म हुआ, तो जौहरी पड़ोसी के घर से बाहर निकला और किराए के उस मकान में वापस गया। वहां जाने पर उसने देखा कि वहां पर कोई भी नहीं था और न ही कोई सामान था। तभी उसे मकान के एक कोने में छिपा हुआ एक आदमी दिखा। जौहरी ने पूछा, ‘कौन हो?’ वह आदमी जौहरी की आवाज पहचान गया और बाहर आया। वह जौहरी का ही एक नौकर था। जौहरी ने नौकर से पूछा कि क्या वे हथियारबंद लोग सिपाही थे? तब नौकर ने बताया कि वे लोग डाकू थे और सब कुछ लूट कर ले गए।

जौहरी को भी भरोसा हो गया कि वे लोग डाकू ही थे, क्योंकि वे घर का सारा सामान लूट ले गए थे। उसके बाद जौहरी सिर पिटने लगा और रोने लगा कि जिन दोस्तों से उसने सारा सामान लिया था, उन्हें वह क्या जवाब देगा। साथ ही उसे शहजादे और शमसुन्निहार की भी चिंता सताने लगी।

सुबह होने पर सारे शहर में चोरी की खबर आग की तरह फैल गई। जौहरी के दोस्त भी उसके घर पर उसे सहानुभूति देने के लिए आए। उन्हें पता था कि जौहरी ने वह मकान किराए पर लिया था। जौहरी के दोस्तों ने उसे चोरी हुई चीजों के लिए चिंता न करने की बात कही। लेकिन कौन जानता था कि जौहरी को शहजादे और शमसुन्निहार की चिंता हो रही थी। उसे न कुछ खाने का मन हो रहा था और न ही कुछ करने का।

अगली दोपहर जौहरी का एक सेवक आकर बोला कि उससे मिलने एक आदमी आया है। उस आदमी ने अंदर जा कर जौहरी से कहा कि वह उससे उसके किराए वाले मकान में बात करेगा। जौहरी यह सुनते ही चौंक गया कि उस अजनबी को किराए वाले घर के बारे में कैसे पता चला। वह व्यक्ति जौहरी को घुमावदार और सुनसान गलियों से ले जाने लगा। चलते-चलते उसने जौहरी से यह भी कहा कि इन्हीं रास्तों से वे डकैत उसके घर गए थे। ये सब सुनकर जौहरी को बड़ी ही हैरानी होने के साथ-साथ डर भी लग रहा था, क्योंकि वह अजनबी जौहरी को उसके किराए के मकान में नहीं, बल्कि किसी और जगह लेकर जा रहा है।

धीरे-धीरे शाम होने लगी और चलते-चलते जौहरी थक भी गया था। साथ ही उसकी घबराहट भी बढ़ने लगी। डर के मारे जौहरी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह उस अजनबी से कुछ पूछ सके। थोड़ी ही देर में दोनों दजला नदी पर पहुंचे। दोनों ने नांव पर बैठकर नदी पार की और दोनों नदी के दूसरे वाले क्षेत्र में पहुंच गए। नदी पार करते ही एक बार फिर दोनों गलियों में चलते जा रहे थे। चलते-चलते दोनों एक एक मकान के सामने पहुंचे और वहां पहुंचकर उस आदमी ने ताली बजाई।

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ताली की आवाज सुनकर उस घर का दरवाजा खुला और दोनों घर के अंदर गए। जौहरी जैसे ही घर के अंदर गया, तो उसने देखा वहां कई सारे लोग बैठे थे। उन लोगों ने जौहरी का स्वागत किया और आदरपूर्वक अपने पास बैठने को कहा। थोड़ी देर में उनका मालिक वहां आया। उसके बाद उन लोगों ने जौहरी से पूछा कि क्या उसने उन्हें पहले कभी देखा? जौहरी ने कहा ‘नहीं, मैंने पहले कभी न तुम लोगों देखा है न ही यह नदी पार की है।’ उसके बाद अचानक उन लोगों ने जौहरी को कहा कि पिछले रात उसके साथ जो भी हुआ वह उन्हें बताए। जौहरी हैरान हो गया कि उन्हें इन सबका कैसे पता चला। तब उन लोगों ने कहा कि उन्हें यह सारी बातें उस स्त्री और पुरुष से पता लगी है। हालांकि, वे लोग जौहरी से भी सारी बात जानना चाहते थे। ये सब सुनते ही जौहरी को समझते देर न लगी कि ये लोग वही डाकू तो नहीं है।

ये सब सुनकर जौहरी ने कहा कि ‘दोस्तों, मेरे साथ जो हुआ वह हुआ, लेकिन मुझे उस व्यक्ति और स्त्री की चिंता सता रही है। अगर तुम सबको उनके बारे में कुछ पता हो तो मुझे बताना।’ इतने में उन्होंने कहा कि जौहरी उनकी चिंता छोड़ दे क्योंकि वो दोनों सुरक्षित हैं। साथ ही उसने कहा कि उन दोनों ने ही जौहरी का पता दिया है और उन्होंने बताया है कि जौहरी उनका मददगार है। आगे डाकुओं ने कहा कि ‘हम लोग किसी पर दया नहीं करते है, फिर भी हमने उन दोनों का पूरा ख्याल रखा है और तुम्हें भी कोई परेशानी नहीं होने देंगे।’

जौहरी ने डाकुओं का आभार प्रकट किया। इसके साथ ही जौहरी ने शहजादे और शमसुन्निहार की पूरी प्रेम कहानी बताई। यह सब जानकर वे लोग हैरान हो गए और कहा, ‘क्या यह व्यक्ति फारस के राजा बका का बेटा अबुल हसन है और वह स्त्री खलीफा की प्रिय शमसुन्निहार है?’ जौहरी ने उनके सवालों का जवाब हां में दिया। यह सब जानने के बाद डाकुओं ने अबुल हसन और शमसुन्निहार के पास जा कर माफी मांगी।

उसके बाद उन डाकुओं ने चोरी का कुछ सामान देकर उन तीनों को सुरक्षित नदी के उस पार पहुंचाने का वादा किया और साथ ही उनका राज छुपाने के लिए वादा लिया। उन तीनों ने कसम खाई कि वे लोग डाकुओं के बारे में किसी को नहीं बताएंगे।

इसके बाद एक डाकू ने उन तीनों को नदी के पार छोड़ दिया। हालांकि, तट पर आते ही सिपाहियों ने उन्हें देख लिया। वहीं, डाकू उन्हें देखते ही अपनी नाव लेकर भाग गया, लेकिन उन तीनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और पूछताछ करने लगे।

जौहरी ने झूठ बोलते हुए कहा कि डाकुओं ने उसके घर पर डाका डाला था और साथ में उन दोनों को भी पकड़ कर नदी के उस पार ले गए थे। न जाने डाकुओं ने क्या सोचा कि उन्होंने उन सबको नदी के इस पार पहुंचा दिया और लूटे हुए कुछ सामान भी वापस कर दिए है। गश्त लगा रहे सिपाही के मुखिया ने उसकी बात का विश्वास कर लिया। उसने फिर शहजादे और शमसुन्निहार से पूछा कि वे लोग कौन हैं। इस पर शहजादे ने कुछ नहीं कहा, लेकिन शमसुन्निहार ने सिपाहियों के दल के मुखिया को अलग ले जा कर कुछ बात की। उसके बाद उस मुखिया ने तुरंत घोड़े से उतर कर शमसुन्निहार को सलाम किया और आदेश देकर नांव मंगवाया। जहां एक नाव पर शमसुन्निहार को बिठा कर घर पहुंचाने का आदेश दिया। वहीं, दूसरी नाव पर शहजादे और जौहरी के साथ उनके सामान को रख कर उनके घर पहुंचाने के लिए भेज दिया। साथ ही उस नाव पर अपने दो सिपाही भी बैठा दिए ताकि दोनों सुरक्षित अपने घर पहुंच जाएं।

वे सिपाही उनके साथ तो चल दिए, लेकिन उन्होंने अपने मुखिया की बात नहीं माने और नाव को कारागार लेकर चले गए। कारागार के प्रधान अधिकारी ने इन लोगों से उनके बारे में पूछा, तो जौहरी ने इस अधिकारी को पूरी बात बताई और कहा कि ‘गश्त दल के मुखिया ने हम पर विश्वास कर के हमें हमारे घर पहुंचाने का आदेश दिया था, लेकिन ये सिपाही हमें लेकर यहां आ गएं।’ यह सुनकर कारागार के अधिकारी ने दोनों सिपाहियों को खूब डांटा और अन्य दो सिपाहियों को आदेश दिया कि दोनों को उनके सामान के साथ शहजादे के घर पहुंचा दे।

घर पहुंचेने के बाद वे इतने थक चुके थे कि उनसे चला भी नहीं जा रहा था। थोड़ी देर बात शहजादे ने अपने नौकरों को आज्ञा दी कि जौहरी को उसके घर पर पहुंचा दिया जाए। जौहरी के घर आते ही उसके घरवालों ने चिंता जताकर उससे पूछताछ शुरू कर दी की वह कहां था? उसने घरवालों की बात को टाल दी और खुद को थका हुआ बताकर अपने कमरे में सोने चला गया।

कुछ दिन बाद जौहरी अपना मन बहलाने के लिए अपने एक मित्र के घर जाने का विचार किया। दोस्त के घर जाते वक्त उसे फिर से वही सेविका मिली। जौहरी काफी डरा हुआ था, उसने सेविका को अपने पीछे आने का इशारा किया। उसके बाद वे एक सुनसान मस्जिद पर पहुंचे और सेविका ने जौहरी से पूछा कि वह डाकुओं से कैसे बचा। जौहरी ने पहले उसका हाल पूछा। सेविका ने कहा कि जब डाकू उनके घर पर आए, तो उनको लगा वे खलीफा के सिपाही हैं। अपनी जान बचाने के लिए वे लोग मकान की छत पर चढ़ गईं और एक भले व्यक्ति के घर में आ गईं। उसने दया करके रात भर उन्हें अपने यहां रहने दिया। सुबह होते ही वे तीनों अपने घर चल गए। महल में जाकर उन्होंने झूठ बोल दिया कि स्वामिनी अपनी एक सहेली के घर रूक गई।

सेविका ने आगे कहा, ‘कल आधी रात को घर के पीछे के घाट पर कुछ हलचल सुनी। जा कर देखा तो स्वामिनी नाव से आई थीं और उनके साथ दो लोग भी थे। फिर हमनें चुपके से उन दोनों आदमियों को एक हजार अशर्फियां दे कर विदा कर दिया। स्वामिनी अब ठीक हैं और उन्होंने हमें डाकुओं द्वारा पकड़े जाने और छूटने की पूरी घटना भी बताई है।’

इसके बाद दासी ने जौहरी को अशर्फियों की दो थैलियां दीं और कहा कि ‘हमारी स्वामिनी ने यह आपके लिए भेजा है। आपका जो भी नुकसान हुआ है आप इससे उसकी पूर्ति करें।’ जौहरी ने सेविका को धन्यवाद कहते हुए वह धन ले लिया। उन पैसों से उसने अपने मित्रों के चोरी हुए समानों की पूर्ति की और जो पैसे बचे थे उससे उसने एक बड़ा और सुंदर मकान बनवाना शुरू कर दिया।

एक दिन वह शहजादे के घर गया उसका हालचाल पूछने। शहजादे के नौकरों ने बताया कि वे जब से आए हैं सिर्फ अपने बिस्तर पर लेटे हैं। जौहरी शहजादे के पास गया और उसने सेविका का सारा समाचार सुनाया। शहजादे ने सब सुनने के बाद जौहरी का शुक्रिया किया।

शहजादे से मिलकर जौहरी जैसे ही घर पहुंचा शमसुन्निहार की वही सेविका रोते हुए उसके घर आई। उसने बताया कि उसकी और शहजादे की जान खतरे में है इसलिए दोनों को तुरंत शहर छोड़ देना चाहिए। सेविका ने कहा कि, उसके साथ की एक सेविका ने शायद खलीफा को सारी बात बता दी है। जिसके बाद खलीफा ने सिपाही भेज कर शमसुन्निहार को बंदी बना लिया है।

यह सुन कर जौहरी के होंश उड़ गए। उसने शहजादे को सारी बात बताई और शहर से दूर जाने की बात कही। शहजादे ने फौरन घोड़ें और कुछ अशर्फियां ली और कुछ सेवकों के साथ दोनों नगर से बाहर निकल गए। एक दिन दोपहर के समय जब वे एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे कि तभी उनपर डाकुओं ने हमला कर दिया। डाकुओं ने उनके सभी नौकरों को मारकर दोनों का सारा सामान लूट लिया।

डाकुओं के जान के बाद दोनों एक मस्जिद पर पहुंचे। सुबह वहां नमाज पढ़ने आए एक व्यक्ति उन्हें देखा तो उसे उनपर दया आ गई। जौहरी ने उस व्यक्ति को डाकुओं के हमले की बात बताई। यह सब सुनकर वह आदमी दोनों को अपने घर पर चलने के लिए कहने लगा, लेकिन जौहरी ने उसकी बात नहीं मानी। जिसके बाद उस आदमी ने दोनों को खाना लाकर दिया। वहीं, शहजादे की हालत काफी खराब होने लगी थी और उससे कुछ नहीं खाया जा रहा था। शहजादे ने अपने जीवन का आखिरी समय भांपते हुए जौहरी से कहा, ‘अब मैं बच नहीं सकता। शमसुन्निहार से अलग होने का दुख अब मैं नहीं झेल सकता हूं। तुमसे बस मेरी अंतिम इच्छा है कि जब मैं मर जाऊं, तो मेरी लाश को इस भले इंसान के पास रखना और बगदाद जा कर मेरी मां को मेरी मरने की खबर देना और कहना कि मुझे दफन करवां दें।’

यह कह कर शहजादे ने अपने प्राण त्याग दिए। जौहरी अबुल के मरने के गम में देर तक रोता रहा। उसके बाद शव को उस आदमी के पास रखवाकर वह बगदाद की ओर चला पड़ा। बगदाद पहुंच कर उसने शहजादे की मां को उसकी मृत्यु की सूचना दी। शहजादे की मां रो-रोकर सेवकों के साथ शहजादे का शव लेने के लिए उस व्यक्ति के पास गई।

वहीं जौहरी अपने घर शहजादे की मौत का शोक मना ही रहा था कि शमसुन्निहार की वही सेविका आई। जौहरी ने उसे शहजादे के मृत्यु की सूचना दी। यह सुन कर सेविका ने रोते हुए कहा कि शमसुन्निहार भी अब इस दुनिया में नहीं रही। खलीफा ने उसे बंदी बनाया था, लेकिन दोनों के प्रेम को देखकर उसका दिल पसीज गया और उसने शमसुन्निहार को आजाद कर दिया। उसी शाम को शमसुन्निहार की हालत खराब हो गई और उसने अपने प्राण त्याग दिए।

उसका शव महल के अंदर बड़े मकबरे में दफनाया गया है। अब मैं चाहती हूं कि शहजादे का शव भी स्वामिनी की कब्र के बगल में दफनाया जाए, ताकि दोनों प्रेमी मर कर भी एक ही जगह रहें। उसने बताया कि खलीफा ने उसे शमसुन्निहार के कब्र की देखरेख करने की अनुमति दी है, तो वहां पर शहजादे की कब्र बनाने में कोई अड़चन नहीं आएगी।

शहजादे का शव आने पर जौहरी ने उसकी मां से अनुमती ली और शव को उसकी प्रेयसी के बगल में दफन करवा दिया। उसके बाद से लोग दूर-दूर के देशों से आ कर उनकी कब्रों पर मन्नत मांगते हैं।

शहरजाद ने इतना कहकर अपनी कहानी पूरी की। इतने में उसकी बहन दुनियाजाद ने कहा कि ‘यह बहुत खूबसूरत कहानी थी।’ उसने उससे पूछा कि ‘क्या तुम्हें और भी कोई कहानी आती है?’ शहरजाद ने कहा कि अगर उसे प्राणदंड न मिले, तो वह अगले दिन शहजादा कमरुज्जमां की कहानी सुनाएगी। उस कहानी को सुनने की इच्छा से महाराज ने उस दिन भी शहरजाद काे प्राणदंड नहीं दिया। जिसके बाद अगली सुबह शहरजाद ने नई कहानी शुरू की।

 

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