स्वामी विवेकानंद की प्रेरक कथाएँ
प्रेरक प्रसंग 1 – स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda Story in Hindi) और अंग्रेज
स्वामी विवेकानंद की कहानियां (Swami Vivekananda Story in Hindi) हमेशा हमे प्रेरणा देती हैं। एक बार स्वामी विवेकानंद रेल से कहीं जा रहे थे। वे जिस डिब्बे में सफर कर रहे थे, उसी डिब्बे में कुछ अंग्रेज यात्री भी थे। उन अंग्रेजों को साधुओं से बहुत चिढ़ थी। वे साधुओं की भर-पेट निंदा कर रहे थे। साथ वाले साधु यात्री को भी गाली दे रहे थे। उनकी सोच थी कि चूंकि साधू अंग्रेजी नहीं जानते हैं, इसलिए उन अंग्रेजों की बातों को नहीं समझ रहे होंगे। इसलिए उन अंग्रेजों ने आपसी बातचीत में साधुओं को कई बार भला-बुरा कहा।
हालांकि, उन दिनों की हकीकत थी कि साधु अंग्रेजी जानते भी नहीं थे। रास्ते में एक बड़ा स्टेशन आया, जहां विवेकानंद के स्वागत में हजारों लोग उपस्थित थे, जिनमें विद्वान एवं अधिकारी भी थे। उन्होंने यहां उपस्थित लोगों को सम्बोधित करने के बाद अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी अंग्रेजी में ही दिए।
अंग्रेज सहयात्री ये सब देख रहे थे। ये देखकर, रेल में उनकी बुराई कर रहे उन अंग्रेज यात्रियों को सांप सूंघ गया। अवसर मिलते ही वे विवेकानंद के पास गए। उन्होंने नम्रतापूर्वक पूछा कि क्या आपने हमारी बात सुनी? स्वामीजी ने सहजता से जवाब दिया। उन्होंने बताया कि उनका मस्तिष्क अपने ही कार्यों में व्यस्त था। इसीलिए उन्हें लोगों की बात सुनने का अवसर नहीं मिला। उनका यह जवाब अंग्रेजों को शर्मसार कर गया। अंग्रेजों ने चरणों में झुककर क्षमा याचना की। वे स्वामीजी के प्रति आदर भाव दिखाने लगे।वे उनके ज्ञान का सम्मान करने लगे।
प्रेरक प्रसंग 2 : पुत्र के लिए प्रार्थना
प्रत्येक माता के मन में यह भाव स्वाभाविक होता है कि उसकी संतान कुल की कीर्ति को उज्जवल करे. प्रथम दो संताने शिशुवय में ही मर गयी थीं, इसीलिए माता भुवनेश्वरी देवी प्रतिदिन शिवजी को प्रार्थना करती कि ‘हे शिव ! मुझे तुम्हारे जैसा पुत्र दो.’ काशी में निवास कर रहे एक परिचित व्यक्ति को कह कर उन्हों ने एक वर्ष तक वीरेश्वर शिवजी की पूजा भी करवाई थी.
माता भुवनेश्वरी का मन-चित्त भगवान शंकर को सतत याद करके प्रार्थना किया करता. एक रात्रि को स्वप्नमें उन्हें महादेव जी को बाल रूप में अपनी गोद में विराजित भी देखा. जागने के बाद वे ‘जय शंकर, जय भोलेनाथ !’ ऐसा बोल कर
प्रार्थना करने लगीं. थोड़े महिनो के बाद उन्होंने पुत्रको जन्म दिया. दि.१२ जनवरी, 1863 का दिन और पवित्र मकरसंक्रांति जैसे पर्व पर महादेव जी की कृपा से प्राप्त हुए पुत्र को माता ने नाम दिया ‘वीरेश्वर’. लेकिन लाड-प्यार में सब उसे ‘बिले’ कहेकर बुलाते थे. थोड़े समय के पश्चात् उसका नाम ‘नरेन्द्रनाथ’ रखा गया. और आगे चल कर यही नरेंद्रनाथ स्वामी विवेकानंद के नाम से पूरे विश्व में विख्यात हुआ।
प्रेरक प्रसंग 3 : सच्ची शिवपूजा
नरेन्द्र की आयु ६ वर्षकी थी. अपने मित्रो के साथ वह मेले में गया. मेले में से नरेन्द्र ने एक शिव जी की मूर्ति खरीदी. मेले में समय कब बीत गया पता ही नहीं चला , संध्या हुई, अँधेरा छाने लगा तब नरेन्द्र तथा सभी मित्र जल्दी से चलते-चलते घर की ओर जाने लगे.
नरेन्द्र अपने मित्रों के एक हाथ में मूर्ति लिए आगे-आगे चल रहा था, पर उनमे से एक मित्र कुछ पीछे रह गया था. अचानक नरेन्द्र ने उसे मुड़ कर देखा कि एक घोड़ागाड़ी उस मित्र की तरफ तेज गति से आ रही है . टक्कर निश्चित जान पड़ रही थी पर ऐसी स्थिति में भी नरेंद्र घबराया नहीं , वह एकहाथ में शिवजी की मूर्ति लिए ही एकदम से दौड़ पड़ा। देखने वाले चीखे , “अरे ! गया, अरे ! गया’” पर ऐन मौके पर नरेंद्र ने मित्र का हाथ पकड़कर एक ओर खींच लिया.
छोटे लड़केकी बहादुरी तथा समयसूचकता को देखकर सभी दंग रहे गए. नरेन्द्र ने घर जाकर जब माँ को यह बात बताई तब माँ ने उसे अपने दिल से लगा कर कहा कि “मेरे बेटे ! आज तूने एक बहादुरी का काम किया है. ऐसे कार्य हंमेशा ही करते रहना. तेरे ऐसे काम से मुझे बहुत प्रसन्नता होगी. और यही सच्ची शिवपूजा है.
प्रेरक प्रसंग 4 : नरेन्द्र की हिम्मत तथा करुणा
नरेन्द्र नियमित व्यायामशाला में जाता था. अखाड़ा का सदस्य बनकर नरेन्द्रनाथ ने लाठी-खड़ग चलाना सीखा. तैरना, नौकाचालन, कुस्ती तथा अन्य खेलों में भी प्रवीणता प्राप्त की. एकबार ‘बॉक्सिंग’ की एक प्रतिस्पर्धा में उन्हें प्रथम पुरस्कार भी मिला था.
एक दिन मित्रों के साथ मिलकर मैदान में वह एक खम्भा खड़ा कर रहा था. रास्ते से गुजर रहे लोग देखने के लिए खड़े हो जाते , लेकिन कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आता. उसी समय एक अंग्रेज नाविक वहाँ आया ओर वह भी लड़कों की मदद करने लगा. सब मिलकर एक भारी खम्भा उठा रहे थे , तभी अचानक खम्भा उस नाविक के माथे पर आ टकराया ओर उसे गंभीर चोट लगी. वह बेहोश हो गया. सभी को लगा कि वह मर गया. नरेन्द्र ओर एक-दो मित्रों के अलावा सभी डर कर भाग गए. नरेन्द्र ने अपनी धोती फाड़ कर उसकी पट्टी बना बेहोश नाविक के माथे पर बांधी. फिर उसके मुह पर जल का छिड़काव किया. थोड़ी देर के बाद जब वह होश में आया तो उसे पासवाले ‘स्कूल’ में ले जाकर सुलाया. डॉक्टर को बुलाया गया और उसका उपचार कराया गया . जब तक वह नाविक अच्छा नहीं हुआ तब तक उसका खाना-पीना, दवाई का प्रबन्ध किया गया. बाद में जब वह ठीक हो गया तब मित्रों के पास से पैसे इकट्ठे कर उसे विदा किया गया। नरेंद्र और साथियों के इस व्यवहार से अंग्रेज नाविक भी गदगद हो गया !
प्रेरक प्रसंग 5 – दूसरों के पीछे मत भागो
एक बार स्वामीजी अपने आश्रम में एक छोटे पालतू कुत्ते के साथ टहल रहे थे। तभी अचानक एक युवक उनके आश्रम में आया और उनके पैरों में झुक गया और कहने लगा – “स्वामीजी मैं अपनी जिंदगी से बड़ा परेशान हूं। मैं प्रतिदिन पुरुषार्थ करता हूं लेकिन आज तक मैं सफलता प्राप्त नहीं कर पाया। पता नहीं ईश्वर ने मेरे भाग्य में क्या लिखा है, जो इतना पढ़ा-लिखा होने के बावजूद भी मैं नाकामयाब हूं।”
युवक की परेशानी को स्वामीजी ने तुरंत समझ लिया। उन्होंने युवक से कहा – “भाई! थोड़ा मेरे इस कुत्ते को कहीं दूर तक सैर करा दो। उसके बाद मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूंगा।”
स्वामीजी ने पूछा, “भाई, मेरा कुत्ता इतना कैसे थक गया? तुम तो बड़े शांत दिख रहे हो। क्या तुम्हें थकावट नहीं हुई?” युवक ने कहा, “स्वामीजी, मैं धीरे-धीरे आराम से चल रहा था, लेकिन मेरा कुत्ता अशांत था। सभी जानवरों के पीछे दौड़ता था, इसीलिए बहुत थक गया था।”
तब विवेकानंद ने कहा, “भाई, तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर तो यही है! तुम्हारा लक्ष्य तुम्हारे आसपास है, लेकिन तुम उससे दूर चलते हो। अन्य लोगों के पीछे दौड़ते रहते हो और तुम जो चाहते हो वह दूर हो जाता है।”
युवक ने विवेकानंद के उत्तर से संतुष्ट होकर अपनी गलती को सुधारने का निर्णय लिया।
कहानी की सीख : अपने लक्ष्य पर ध्यान रखो और भटकाने वाली चीज़ों से दूरी बनाओ।
प्रेरक प्रसंग 6 – स्वामी विवेकानंद और फ्रांसीसी मेजबान
स्वामी विवेकानंद अमेरिका के शिकागो में अपना ऐतिहासिक भाषण देने गए हुए थे। उनका व्याख्यान काफी प्रसिद्ध हो चुका था। अपने भाषण को पूरे विश्व पटल के सामने रखने के लिए स्वामी विवेकानंद अन्य देशों का भ्रमण करने के लिए निकले। इसी क्रम में उन्हें एक फ्रांसीसी विद्वान ने अपने घर आमंत्रित किया। स्वामी जी उनके घर पर पहुंचे। स्वामी जी का स्वागत किया गया। स्वामी जी के लिए फ्रांसीसी विद्वान ने स्वामी जी के लिए अच्छे भोजन का प्रबंध किया। विदेश में इस तरह का भोजन बड़े सौभाग्य की बात बड़े सौभाग्य की बात थी।
भोजन उपरांत वेद वेदांत और धर्म की रचनाओं पर बात चलने लगी। स्वामी जी ने वहां एक मोटी पुस्तक देखा। पुस्तक लगभग डेढ़ हजार पृष्ठों की होगी। स्वामी जी ने अपने मेजबान से पूछा यह क्या है? मैं इसका अध्ययन करना चाहता हूं। मेजबान ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा क्या आप हो फ्रांसीसी आती हैं स्वामी विवेकानंद ने जवाब दिया, “नहीं”।
स्वामी जी ने कहा आप मुझे पुस्तक तो दें। चूंकि फ्रांसीसी मेजबान थे और स्वामी जी मेहमान थे। उन फ्रांसीसी सज्जन ने अनमने ढंग से उस पुस्तक को स्वामी जी को पढ़ने के लिए दिया। स्वामी जी उस पुस्तक को अपने दोनों हाथों में रखकर 1 घंटे के लिए योग साधना में बैठे हैं बैठ गए।
जैसे ही एक घंटा बीता, फ्रांसीसी विद्वान कमरे में आ पहुंचे। आते के साथ उन्होंने स्वामी विवेकानंद से प्रश्न पूछा क्या आपने अध्ययन कर लिया स्वामी जी ने कहा अवश्य। मेजबान ने कहा मजाक ना करें स्वामी जी ने कहा मैं सत्य कह रहा हूं। स्वामी जी ने कहा आपको अगर कोई संदेह हो तो आप पूछ सकते हैं। उन सज्जन ने एक पृष्ठ खोला और स्वामी जी से उसके बारे में पूछा स्वामी जी ने अक्षरसः जवाब दे दिया।
फ्रांसीसी विद्वान के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं थी। स्वामी जी के चरणों में गिर गए। उस विद्वान ने स्वामी जी जैसा व्यक्ति आज तक नहीं देखा था। उन्हें यकीन हो गया यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है यह असाधारण है।
प्रेरक प्रसंग 7 –समस्या का सामना ही समाधान
एक बार बनारस में स्वामी विवेकनन्द जी मां दुर्गा जी के मंदिर से निकल रहे थे कि तभी वहां मौजूद बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया. वे उनसे प्रसाद छिनने लगे वे उनके नज़दीक आने लगे और डराने भी लगे. स्वामी जी बहुत भयभीत हो गए और खुद को बचाने के लिए दौड़ कर भागने लगे. वो बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए और वे भी उन्हें पीछे पीछे दौड़ाने लगे.
पास खड़े एक वृद्ध सन्यासी ये सब देख रहे थे, उन्होनें स्वामी जी को रोका और कहा, “रुको! डरो मत, उनका सामना करो.” वृद्ध सन्यासी की ये बात सुनकर स्वामी जी तुरंत पलटे और बंदरों के तरफ बढऩे लगे. उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उनके ऐसा करते ही सभी बन्दर तुरंत भाग गए. उन्होनें वृद्ध सन्यासी को इस सलाह के लिए बहुत धन्यवाद किया.
इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली और कई सालों बाद उन्होंने एक संबोधन में इसका जिक्र भी किया और कहा, “यदि तुम कभी किसी समस्या से भयभीत हो, तो उससे भागो मत, पलटो और सामना करो.” वाकई, यदि हम भी अपने जीवन में आये समस्याओं का सामना करें और उससे भागें नहीं तो बहुत सी समस्याओं का समाधान हो जायेगा!
प्रेरक प्रसंग 8- मंजिल की सही पहचान करे !
एक बार स्वामी विवेकानन्द के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था. वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला कि महाराज मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूँ मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया. भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ, धनवान नहीं हो पाया हूँ.
स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए. उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा, “तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा.”
आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा. काफी देर तक अच्छी खासी सैर करा कर जब वो व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहुँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था जबकि कुत्ता हाँफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था. स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा, “कि ये कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ सुथरे और बिना थके दिख रहे हो.” तो व्यक्ति ने कहा, “मैं तो सीधा साधा अपने रास्ते पे चल रहा था लेकिन ये कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था. हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसीलिए ये थक गया है.”
स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा, “यही तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आस पास ही है वो ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पे जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो.”
प्रेरक प्रसंग 9 – सच बोलने की हिम्मत अनमोल !
स्वामी विवेकानंद एक दिन कक्षा में मित्रों को कहानी सुना रहे थे. सभी इतने मग्न थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब मास्टरजी कक्षा में आये और पढ़ाना शुरू कर दिया. मास्टरजी को कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी. “कौन बात कर रहा है?” उन्होंने पूछा. सभी ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ इशारा कर दिया. मास्टरजी ने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और पाठ से संबंधित एक प्रश्न पूछने लगे. जब कोई उत्तर न दे सका, तो मास्टरजी ने स्वामी जी से भी वही प्रश्न किया.
उन्होंने उत्तर दे दिया. मास्टरजी को यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बातचीत में लगे थे. उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी. सभी छात्र बेंच पर खड़े होने लगे, स्वामी जी ने भी यही किया. तब मास्टर जी स्वामी जी से बोले, “तुम बैठ जाओ.” स्वामी जी ने कहा, “नहीं सर, मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि मैं ही इन छात्रों से बात कर रहा था.” सभी उनकी सच बोलने की हिम्मत देख बहुत प्रभावित हुए.
प्रेरक प्रसंग 10- मन की शक्ति अभ्यास से आती है
यह बात उन दिनों की है जब स्वामी विवेकानंद देश भ्रमण में थे. साथ में उनके एक गुरु भाई भी थे. स्वाध्याय, सत्संग एवं कठोर तप का अविराम सिलसिला चल रहा था. जहां कहीं अच्छे ग्रंथ मिलते, वे उनको पढ़ना नहीं भूलते थे. किसी नयी जगह जाने पर उनकी सब से पहली तलाश किसी अच्छे पुस्तकालय की रहती.
एक जगह एक पुस्तकालय ने उन्हें बहुत आकर्षित किया. उन्होंने सोचा, क्यों न यहां थोड़े दिनों तक डेरा जमाया जाये. उनके गुरुभाई उन्हें पुस्तकालय से संस्कृत और अंगरेजी की नयी-नयी किताबें लाकर देते थे. स्वामीजी उन्हें पढ़कर अगले दिन वापस कर देते.
रोज नयी किताबें वह भी पर्याप्त पृष्ठों वाली इस तरह से देते एवं वापस लेते हुए उस पुस्तकालय का अधीक्षक बड़ा हैरान हो गया. उसने स्वामी जी के गुरु भाई से कहा, “क्या आप इतनी सारी नयी-नयी किताबें केवल देखने के लिए ले जाते हैं? यदि इन्हें देखना ही है, तो मैं यों ही यहां पर दिखा देता हूँ. रोज इतना वजन उठाने की क्या जरूरत है.”
लाइब्रेरियन की इस बात पर स्वामी जी के गुरु भाई ने गंभीरतापूर्वक कहा, “जैसा आप समझ रहे हैं वैसा कुछ भी नहीं है. हमारे गुरु भाई इन सब पुस्तकों को पूरी गंभीरता से पढ़ते हैं, फिर वापस करते हैं.”
इस उत्तर से आश्चर्यचकित होते हुए लाइब्रेरियन ने कहा, यदि ऐसा है तो मंं उनसे जरूर मिलना चाहूंगा. अगले दिन स्वामी जी उससे मिले और कहा, महाशय, आप हैरान न हों. मैंने न केवल उन किताबों को पढ़ा है, बल्कि उनको याद भी कर लिया है. इतना कहते हुए उन्होंने वापस की गयी कुछ किताबें उसे थमायी और उनके कई महत्वपूर्ण अंशों को शब्दश: सुना दिया.
लाइब्रेरियन चकित रह गया. उसने उनकी याददाश्त का रहस्य पूछा. स्वामी जी बोले, “अगर पूरी तरह एकाग्र होकर पढ़ा जाए, तो चीजें दिमाग में अंकित हो जाती हैं. पर इसके लिए आवश्यक है कि मन की धारणशक्ति अधिक से अधिक हो और वह शक्ति अभ्यास से आती है.”
प्रेरक प्रसंग 11 – नियत अच्छी हो तो हिम्मत मृत्यु को मात भी दे सकती है
एक अंगरेज मित्र तथा कु. मूलर के साथ स्वामीजी मैदान में टहल रहे थे. उसी समय एक पागल सांड तेजी से उनकी ओर बढ़ने लगा. अंगरेज सज्जन भाग कर पहाड़ी के दूसरी छोर पर जा खड़े हुए. कु. मूलर भी जितना हो सका दौड़ी और घबराकर गिर पड़ीं. स्वामीजी ने उन्हें सहायता पहुंचाने का कोई और उपाय न देख खुद सांड के सामने खड़े हो गये और सोचने लगे, ह्यचलो, अंत आ ही पहुंचा.
बाद में उन्होंने बताया था कि उस समय उनका मन हिसाब करने में लगा हुआ था कि सांड उन्हें कितनी दूर फेंकेगा. लेकिन कुछ देर बाद वह ठहर गया और पीछे हटने लगा. अपने कायरतापूर्ण पलायन पर वे अंगरेज बड़े लज्जित हुए. कु. मूलर ने पूछा कि वे ऐसी खतरनाक स्थिति से सामना करने का साहस कैसे जुटा सके? स्वामीजी ने पत्थर के दो टुकड़े उठाकर उन्हें आपस में टकराते हुए कहा, खतरे और मृत्यु के समक्ष मैं स्वयं को चकमक पत्थर के समान सबल महसूस करता हूं, क्योंकि मैंने ईश्वर के चरण स्पर्श किये हैं.
प्रेरक प्रसंग 12 – केवल लक्ष्य पर ध्यान लगाओ
स्वामी विवेकानंद अमेरिका में एक पुल से गुजर रहे थे. तभी उन्होंने देखा कि कुछ लड़के नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बन्दूक से निशाना लगा रहे थे. किसी भी लड़के का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था. स्वामी जी ने खुद बन्दूक संभाली और निशाना लगाने लगे. उन्होंने एक के बाद एक 12 सटीक निशाने लगाए. सभी लड़के दंग रह गए और उनसे पुछा, “स्वामी जी, आप ये सब कैसे कर लेते हैं?” इस पर स्वामी विवेकानंद ने कहा, “जो भी काम करो अपना पूरा ध्यान उसी में लगाओ.”
अन्य कहानियाँ
देने का आनंद अधिक होता
उन दिनों स्वामी विवेकानंद अमरीका में एक महिला के यहां ठहरे हुए थे, जहां अपना खाना वे खुद बनाते थे। एक दिन वे भोजन करने जा रहे थे कि कुछ भूखे बच्चे पास आकर खड़े हो गए। स्वामी विवेकानंद ने अपनी सारी रोटियां उन बच्चों में बांट दी। यह देख महिला ने उनसे पूछा, ‘आपने सारी रोटियां उन बच्चों को दे डालीं। अब आप क्या खाएंगे?’ उन्होंने मुस्कुरा कर जवाब दिया, ‘रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करने वाली चीज है। इस पेट में न सही, उस पेट में ही सही। देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है।’
सामना करो अपने डर का
एक बार बनारस में एक मंदिर से निकलते हुए विवेकानंद को बहुत सारे बंदरों ने घेर लिया। वे खुद को बचाने के लिए भागने लगे, लेकिन बंदर उनका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। पास खड़े एक वृद्ध संन्यासी ने उनसे कहा, ‘रुको और उनका सामना करो!’ विवेकानंद तुरंत पलटे और बंदरों की तरफ बढऩे लगे। उनके इस रवैये से सारे बंदर भाग गए। इस घटना से उन्होंने सीख ग्रहण की कि डर कर भागने की अपेक्षा मुसीबत का सामना करना चाहिए। कई सालों बाद उन्होंने एक संबोधन में कहा भी, ‘यदि कभी कोई चीज तुम्हें डराए तो उससे भागो मत। पलटो और सामना करो।
दूसरों के पीछे मत भागो
एक व्यक्ति विवेकानंद से बोला, ‘मेहनत के बाद भी मैं सफल नहीं हो पा रहा।’ इस पर उन्होंने उससे अपने डॉगी को सैर करा लाने के लिए कहा। जब वह वापस आया तो कुत्ता थका हुआ था, पर उसका चेहरा चमक रहा था। इसका कारण पूछने पर उसने बताया, ‘कुत्ता गली के कुत्तों के पीछे भाग रहा था जबकि मैं सीधे रास्ते चल रहा था।’ स्वामी बोले, ‘यही तुम्हारा जवाब है। तुम अपनी मंजिल पर जाने की जगह दूसरों के पीछे भागते रहते हो। अपनी मंजिल खुद तय करो।’
श्रेष्ठ है सादा जीवन
सादा जीवन जीने के पक्षधर थे स्वामी विवेकानंद। वह भौतिक साधनों से दूर रहने के की सीख दूसरों को दिया करते थे। वे मानते थे कि कुछ पाने के लिए पहले अनावश्यक चीजें त्याग देनी चाहिए और सादा जीवन जीना चाहिए। भौतिकतावादी सोच लालच बढ़ाकर हमारे लक्ष्य में बाधा बनती है।
रहो दिखावे से दूर
विदेश जाने पर एक बार स्वामी विवेकानंद से पूछा गया, ‘आपका बाकी सामान कहां है?’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘बस यही सामान है।’ कुछ लोगों ने व्यंग्य करते हुए कहा, ‘अरे! यह कैसी संस्कृति है आपकी? तन पर केवल एक भगवा चादर लपेट रखी है।’ इस पर वह मुस्कुराकर बोले, ‘हमारी संस्कृति आपकी संस्कृति से अलग है। आपकी संस्कृति का निर्माण आपके दर्जी करते हैं, जबकि हमारी संस्कृति का निर्माण हमारा चरित्र करता है। संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है।’ इससे हमें सीख मिलती है कि बाहरी दिखावे से दूर रह कर अपने चरित्र के विकास पर ध्यान देना चाहिए।