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आँवला के गुण उपयोग व फायदा I Benefits of Gooseberry

आँवला (Gooseberry) भारत में सहस्राब्दियों से उपयोग किया जाने वाला एक पारम्परिक फल है जिसे विभिन्न रूपों में अपनाया जाता रहा है। भारत व अन्य विदेशो में भी आँवले का धार्मिक महत्त्व बहुत है.

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को आँवला नवमी मनायी जाती है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी (आँवला-ग्यारस) कहा जाता है, इस दिन आमलकी (आँवला) वृक्ष के विशेष पूजन की पुरातन परम्परा है।

यह भी लिखा मिलता है कि एक आँवला (Amla) वृक्ष लगाने वाले को राजसूय यज्ञ करने के समतुल्य पुण्यलाभ मिलता है। एक घटनानुसार जब पृथ्वी जलमग्न हो गयी थी तो ब्रह्माजी कमल पुष्प पर विराजमान् होकर परब्रह्म की तपस्या कर रहे थे, तपरत् स्थिति में ईश्वप्रेम में ब्रह्मदेव के नेत्रों से अनुरागपूर्ण अश्रु बह निकले जिससे आँवले का जन्म हुआ।

कहीं-कहीं आँवले के वृक्ष का पूजन धरती माता के रूप में किया जाता है। इसके पत्तों व फलों का प्रयोग पूजा में किया जाता है एवं घरों में इसे लगाना विशेष शुभ माना जाता है। विशेष रूप में कार्तिक मास में हिमाचल प्रदेश में इसे पुनीत रूप में पूजा जाता है।

शरद पूर्णिमा (कौमुदी व्रत) में भी आँवला वृक्ष पूजा जाता है। शनि प्रदोष व्रत में आँवला महत्त्वपूर्ण है एवं नित्य सोमवार व्रत में शिव व गौरी के पूजन में आँवले का महत्त्व है। सत्यनारायण व्रत में इसकी पत्तियाँ पूजा में प्रयोग की जाती हैं।

भारत-पाकिस्तान के अतिरिक्त यह उज़्बेकिस्तान, श्रीलंका, चीन व मलेशिया में भी पाया जाता है। यहाँ अबकी बार इसके गुणों व उपयोगों का वर्णन किया जा रहा है ताकि घरेलु व औषधीय रूपों में इसकी उपयोगिता को जनसामान्य समझ सके.

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आंवले के गुण (Quality Of Amla) –

यकृत-विषों, उच्च रक्त-कोलेस्टॅराल एवं आयुसम्बन्धी वृक्क-विकारों से राहत प्रदान करने में आँवले के एण्टिआक्सिडेण्ट गुण धर्म लाभप्रद सिद्ध हुए हैं।

आँवला के फल मूत्रवर्द्धक (डाइयूरेटिक), शीतल (रेफ्रि़जरॅण्ट) व रेचक (लॅक्सेटिव) होते हैं। सूखे फल मधुमेह व पेचिष में खिलाये जाते हैं। पीलिया, अपच, एनीमिया में भी उपयोगी क्योंकि इसमें लौह पाया जाता है तथा यह पच रहे भोजन के अवशोषण को बढ़ाता है।

बीजों का प्रयोग अस्थमा व ब्रोंकाइटिस के उपचार में किया जाता रहा है। पत्तियाँ पौष्टिक चारे के रूप में प्रयोग की जाती रही हैं। यकृत रक्त को साफ करने की एवं वृक्क पानी को साफ़ करने की प्रक्रिया में नैसर्गिक फ़िल्टर्स के कार्य करते हैं किन्तु चैबीसों घण्टे शरीर में आ रहे एवं बन रहे विषों से भी इन अंगों को जूझना पड़ता है.

इन अंगों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने में आँवला लाभदायक देखा गया है, अतः वृक्कों को एवं विशेषतः अति उपयोगी यकृत को सुचारु रखने में आँवले ने अपना महत्त्व सिद्ध किया है।

विटामिन-सी (एस्कार्बिक अम्ल) की अधिकता से आँवले का प्रयोग बढ़ी उमर के प्रभाव को धीमा करने में सहायक है। बुढ़ापे में विभिन्न कोशिकाओं व ऊतकों को क्षति पहुँच रही होती है। ये हानियाँ आक्सीजन-फ्ऱी रेडिकल्स से हो रही होती हैं जिन्हें नष्ट करते हुए विटामिन-सी वृद्धावस्थाजनित प्रभावों को मंदा करता है।

विटामिन-ई के साथ मिलकर विटामिन-सी लिपिड्स के पॅराक्सिडेशन को रोकता है, लिपिड-पॅराक्सिडेशन में वसाभों (लिपिड्स) का आक्सिडेटिव विघटन होता है जिससे भी कोशिकाओं को क्षति पहुँचती है।

विटामिन-सी की अधिकता के कारण आँवला मधुमेह में भी उपयोगी देखा गया है, यह अग्न्याशय से इन्स्युलिन के उत्पादन को प्रेरित करता है तथा मधुमेह जनित नेत्रविकृति को कम करने में भी सहयोगी है।

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मधुमेह में करेले के रस के साथ व अन्य रोगों अथवा स्वस्थ स्थितियों में भी अन्य रसों के साथ आँवले का रस मिलाकर स्वाद व पौष्टिकता बढ़ायी जा सकती है।

प्रतिरक्षा-तन्त्र को मजबूत करे (Immune System ) –

आँवले के सेवन में शरीर में श्वेतरक्त कोषिकाओं में स्पष्ट बढ़त पायी गयी है, अधिक सफ़ेद रक्त कोशिकाएँ अर्थात् संक्रमणों से लड़ने के लिये अधिक सैनिक। आँवले को न जाने कब से ‘प्रतिरक्षा-वर्द्धक’ (इम्युनिटी-बूस्टर) कहा जाता रहा है।

फेफड़ों के रोगों में – ब्रोंकाइटिस, अस्थमा व फेफड़ों के तपेदिक (टी.बी.) के उपचार में आँवला सहायक सिद्ध हुआ है। उपरोक्त के अतिरिक्त आँवले में विषाणुरोधी तत्त्व भी पाये गये हैं,

एनीमिया, अपच, पेट में अम्लीयता, मूत्ररोगों, छालों, उच्चरक्तचाप सहित विभिन्न हृदयरोगों के भी उपचार में आँवला उपयोगी पाया गया है। आँवला हानिप्रद कोलेस्टेराल (अर्थात् लो डेन्सिटी लिपिड) का स्तर घटाता एवं लाभप्रद कोलेस्टॅराल (अर्थात् हाई डेन्सिटी लिपिड) के स्तर को बढ़ाता है।

आँवले के पोषणात्मक अवयव – विटामिन-सी, विटामिन-बी, लौह, कैल्शियम,फ़ास्फ़ोरस, केरोटिन व रेशे। इनके अतिरिक्त इसमें पोटेशियम, ताम्र(ताँबा), मैग्नीशियम, मेंग्नीज़ व जस्ता भी पाया जाता है।

आँवले के प्रयुक्त भाग – ताजे अथवाc, बीज, पत्तियाँ, जड़ की छाल, पुष्प। आँवले को अन्य विविध रूपों में उपयोग में लाया जाते रहा है, जैसे कि अचार, मुरब्बा, गूदे को सादा सुखाकर अथवा कुछ मसाले के साथ सुखाकर अथवा रस निकालकर अथवा तैल के रूप में।

त्रिफला (हरड़-बहेड़ा-आँवला) व च्यवनप्राश में मुख्य घटक है आँवला तथा विभिन्न आयुर्वेदीय व अन्य औषधियों में आँवले के चूर्ण को कैप्सूल के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

आंवले से जुडी सावधानी (Cos of Amla) –

विटामिन-सी आँवले में बहुत होता है एवं कैल्सियम भी होता है इसलिये एवं यह विटामिन शरीर में कैल्शियम के अवषोषण को बढ़ाता है इसलिये भी कैल्शियम व विटामिन-सी की अधिकता से हो सकने वाले रोगों की स्थिति में आँवले का सेवन अधिक न करें, जैसे कि पथरी के प्रकरणों में।

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आँवले से सम्बन्धित भ्रांतियाँ एवं निराकरण –

भ्रांति – आँवले से पेट ख़राब हो जाता है.
निराकरण – ऊपर पोषणात्मक विवरण में आपने जस्ते इत्यादि की उपस्थिति देख ही ली होगी, जस्ता तो दस्त दूर करने में उपयोगी रहता है।

भ्रांति – आँवले से सर्दी हो जाती है.
निराकरण – आँवला तो विटामिन-सी की खान होता है, विटामिन-सी को सर्दी-ज़ुकाम दूर करने वाला विटामिन कहा जाता है।

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