“The Knowledge Library”

Knowledge for All, without Barriers…

 

An Initiative by: Kausik Chakraborty.

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Knowledge for All, without Barriers……….
An Initiative by: Kausik Chakraborty.

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अपना हर काम खुद ही करना है..

दिल्ली से गोवा की उड़ान में एक सज्जन मिले, साथ में उनकी पत्नी भी थी, सज्जन की उम्र लगभग 80 की रही होगी,मैंने पूछा नहीं लेकिन उनकी पत्नी भी 75 के पार ही होंगी, पत्नी खिड़की की ओर बैठी थी, सज्जन बीच में और मैं सबसे किनारे वाली सीट पर था, प्लेन के उड़ान भरने के साथ ही पत्नी ने खाने का कुछ सामान निकाला और पति की ओर किया, पति कांपते हाथों से धीरे धीरे खाने लगे…

फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व हुआ तो उन लोगों ने राजमा चावल का आर्डर किया, दोनों आराम से राजमा चावल खा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक में उन सज्जन ने कोई जूस लिया था…

खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल का ढक्कन खोलना शुरु किया तो ढक्कन उनसे खुला ही नहीं, सज्जन कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और मैं लगातार उन्हें देखे जा रहा था, मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें दिक्कत हो रही थी तो शिष्टाचार वश मैंने कहा :- लाइए, मैं खोल देता हूं !

सज्जन ने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और बोले :- बेटा जी, ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा ! मैंने कुछ कहा नहीं लेकिन प्रश्नभरी निगाहों से उन्हें देखता रहा…

ये सज्जन ने कहा :- बेटा जी, आज तो आप खोल देंगे लेकिन अगली बार कौन खोलेगा, इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए, पत्नी भी पति की ओर देख रही थी, जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था, लेकिन सज्जन उसे खोलने की कोशिश में लगे रहे और बहुत कोशिशों के बाद अंततः उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया, दोनों आराम से जूस पी रहे थे…

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मुझे दिल्ली से गोवा की इस उड़ान में जिंदगी का एक सबक मिला, सज्जन ने मुझे बताया :- हमने एक नियम बना रखा है अपना हर काम खुद ही करना है…, घर में बच्चे हैं, हंसता खेलता परिवार है, सब साथ ही रहते हैं लेकिन अपनी रोज की जरूरतों के लिए केवल पत्नी की ही मदद लेते हैं, बाकी किसी की नहीं, दोनों एक दूसरे की जरूरतों को समझते हैं…

सज्जन ने मुझसे कहा :- जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए, एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो बेटा, समझो बिस्तर पर ही पड़ जाउंगा, फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं वो काम उससे, फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा, अभी चलने में पांव कांपते हैं,खाने में भी हाथ कांपते हैं लेकिन जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए…

हम गोवा जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे, हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं,बेटे बहू कहते हैं कि अकेले आपको दिक्कत होगी लेकिन उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना फिरना बंद करके खुद को घर में बंद कर लेंगे, सारी जिंदगी खूब काम किया, अब सब कुछ बेटों को देकर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं और हम दोनों उसी से आराम से घूमते हैं, जहां जाना होता है, एजेंट टिकट बुक करा देता है, टैक्सी घर पर आ जाती है,वापसी में एयरपोर्ट पर ही टैक्सी आ जाती है ! होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है, स्वास्थ्य व उम्र के अनुसार सब एकदम ठीक है, बस, कभी कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती लेकिन थोड़ा दम लगाओ तो वो भी खुल जाती है…

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मेरी तो आंखें ही खुली रह गई, मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा लेकिन यहां तो कुछ ही पलों में मैंने पूरे जीवन की ही फिल्म देख ली ! एक ऐसी फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था…

तक हो सके “आत्मनिर्भर” रहो, जहां तक संभव हो, अपना काम स्वयं ही करें…

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